महा कवि वाल्मिकी जी
महाकवि ऋषि वाल्मीकि जी के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं... अपने घर पर प्रतिदिन पर उनकी द्वारा रचित श्री रामायण जी का अध्ययन कर अपने धर्म की रक्षा करें..
एक बार सभी ऋषि मिलकर ब्रहमऋषि विश्वामित्र जी की स्तुति करने लगे और कहने लगे महाराज आपसे ज्ञानवान कोई नहीं आप सर्वश्रेष्ठ है ! इस पर विश्वामित्र जी बोले मैंने ऐसा कोई काम नहीं किया कि आप सब मुझे श्रेष्ठ कहे ! विश्वामित्र जी के वचन सुनकर सभी ऋषियों ने कहा हे ब्रहमऋषि जिस राम का सारी सृष्टि ध्यान करती है वह रामजी भी आपके शिष्य है इसलिए आप श्रेष्ठ है ! यह सुनकर विश्वामित्र जी ने संत सभा में बैठे ऋषि वशिष्ट जी की तरफ इशारा कर कहा , मुझमें ऐसा कोई गुण नहीं कि रामजी मेरे शिष्य बने यह सब वशिष्ट जी की कृपा है यदि वसिष्ठ जी उन्हें मेरे पास न भेजते तो वह मुझे गुरु कभी स्वीकार न करते इसलिए वह ही सर्वश्रेष्ठ है ! विश्वामित्र जी के ऐसे वचन सुनकर वशिष्ट जी ने कहा हे ऋषियों विश्वामित्र केवल मुझे सम्मान देने के लिए ऐसा कह रहे है , श्रेष्ठ तो महाऋषि वाल्मीकि जी है जिन्होंने राम जन्म से हजारो वर्ष पहले रामायण की रचना कर दी !
जब रावण सीता माता का अपहरण कर उन्हें ले गए तब रामजी विलाप करने लगे और पेड़ पत्तो से लिपट कर रोने लगे , उस समय एक ऋषि ने उनसे पूछा यह कौन है और क्यों रो रहे है ? इस पर लक्ष्मण जी ने कहा यह विष्णु जी के अवतार दशरथ जी के पुत्र रामचंद्र जी है , इनकी पत्नी को रावण उठाकर ले गए है इसलिए यह रो रहे है ! उस ऋषि ने कहा यदि पत्नी से इतना प्रेम था तो इस भयानक वन में आये ही क्यों ? यह सुन लक्ष्मण जी ने कहा राक्षसों का संहार करने के लिए इन्होने अवतार लिया है ! उस ऋषि ने कहा क्या वैकुण्ठ में बैठे बैठे राक्षसों का संहार नहीं कर सकते थे ? यह सुनकर रामजी ने कहा राक्षसों का संहार तो मैं वैकुण्ठ में बैठे बैठे भी कर सकता था पर वाल्मीकि जी ने लिखा था कि रामजी का अवतार होगा और रावण का उनके हाथों उद्धार होगा , उनकी लिखी बातों को काटने की क्षमता मुझमे नहीं है !
जब लव कुश ने राम जी की सारी सेना को मूर्छित कर दिया तो भगवान् राम जी ने स्वयं वाल्मीकि आश्रम की यात्रा नंगे पाँव की और उस स्थान का नाम राम तीर्थ पड़ गया ! भगवान् राम जी ने रामायण में स्वयं वाल्मीकि जी को त्रिकाल ज्ञानी, ब्रह्मज्ञानी और ओमकार स्वरुप कहकर उनकी स्तुति की है ! भगवान् राम ने उन्हें अविनाशी ईश्वर का अंश कहा है ! इसी प्रकार तुलसीदास ने भी कहा है - " तुम त्रिकाल दर्शी मुनि नाथा , विश्व विद्र जिम तुमरे हाथा "अर्थात - हे वाल्मीकि जी आप तीनो कालों का ज्ञान रखते है और यह सारी सृष्टि आपके हाथ में एक बेर के समान है !
जब लव और कुश ने राम जी की पूरी सेना को मूर्छित कर दिया तब सीता माता के प्रार्थना करने पर उन्होंने मंत्र शक्ति द्वारा अमृत का निर्माण किया ! वह अमृत सारी सेना पर छिड़क दिया और सारी सेना जीवित हो गयी ! उन्होंने वह अमृत दुरूपयोग के डर से बेर के पेड़ो की जड़ में दबा दिया ! जिस जगह वह अमृत दबाया उस जगह श्रीहरमंदिर साहिब सुशोभित है ! आज भी श्री हर मंदिर साहब के पवित्र तालाब में नहाने से लोगों के रोग दूर हो जाते है ! अमृत दबाने के कारण ही इस शहर का नाम अमृतसर पड़ गया ! कुश को उसके पिता का राज्य अयोध्या मिला और लव ने अपने लिए लव्हर नगर बसाया जो आज के समय का लाहौर है और पकिस्तान के पंजाब में स्थित है !