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भारत का गौरवशाली इतिहास-203 महाराणा सांगा

भारत का गौरवशाली इतिहास - 203 महाराणा सांगा एक अपराजित योद्धा ! कुछ तस्वीरें स्वयं में पूरा महाकाव्य होती हैं। उससे आंख नहीं हटती... इस महान योद्धा के बारे में आप जितना पढ़ेंगे, उतना ही आश्चर्य में डूबते चले जायेंगे। लगभग सौ युद्ध और अधिकांश में विजय! शरीर के हर अंग पर युद्ध के चिन्ह सजाए इस रणकेसरी को खंडहर कहा गया, सैनिकों का भग्नावशेष... जैसे रणचंडी ने उन्हें अपने हाथों से पुरस्कार स्वरूप घावों के आभूषण पहनाए हों... कल्पना कीजिये, एक योद्धा की एक आँख चली गयी और फिर भी वह लड़ता रहा। किसी दूसरे युद्ध में एक पैर नाकाम हो गया, वह फिर भी लड़ता रहा। किसी युद्ध में एक हाथ कट गया, वह फिर भी उसी उत्साह के साथ लड़ता रहा... जैसे युद्ध युद्ध नहीं, उसकी पूजा हो, तपस्या हो... अद्भुत है न? ऐसी अद्भुत गाथाएं भारत में ही मिलती हैं... ऐसे योद्धा यहीं जन्म ले सकते हैं। कुछ योद्धाओं की भूख प्यास युद्ध से ही तृप्त होती है। उन्हें न शरीर के घाव विचलित करते हैं, न परिस्थितियों की विकरालता रोक पाती है। युद्ध उनके लिए आनन्द का उत्सव होता है। राणा सांगा वैसे ही योद्धा रहे... राजस्थान से बाहर के अधिकांश लोग म...

भारत का गौरवशाली इतिहास - 202 उधम सिंह

भारत का गौरवशाली इतिहास-- 202 13 मार्च 1940  जलियांवाला बाग का लंदन में लिया था बदला,  उधम सिंह ने  गोलियों से उड़ा दिया था Michael O'Dwyer को.... 13 अप्रैल 1919, दिन था बैसाखी का. हज़ारों की संख्या में लोग अमृतसर के गोल्डन टेम्पल से डेढ़ किलोमीटर दूर बने जलियांवाला बाग में मेले में आए थे. इस मेले में हर उम्र के जवान और बुजुर्ग आदमियों के साथ-साथ महिलाएं और बच्चे भी शामिल हुए थे. लेकिन इनमें से किसी को भी ये मालूम नहीं था, कि चंद मिनटों में मेले की ये रौनक मातम में बदल जाएगी. हंसते-खेलते बच्चों की आवाज़ें नहीं चारों ओर सिर्फ चीखें सुनाई देंगी और मेले में मौजूद सभी लोगों का नाम इतिहास के सबसे भयावह हादसे में शामिल हो जाएगा. इस हादसे के बाद पंजाब का ही एक क्रांतिकारी उधम सिंह के किस्से हर तरफ होंगे.           पंजाब के सुनाम में जन्मे उधम सिंह को गवर्नव जनरल माइकल डायर  की हत्या की वजह से जाने जाते हैं. उधम सिंह ने ही 13 मार्च, 1940 को लंदन के कैक्सटन हॉल में डायर को गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया था.         जलिया...

भारत का गौरवशाली इतिहास- 201 भारतीय ग्रंथों में स्त्री का स्थान

भारत का गौरवशाली इतिहास-- 201 *मनुस्मृति के अनुसार समाज में महिलाओं का स्थान!* 1 - *"उपाध्यायान्दशाचार्य आचार्याणां शतं पिता।*  *सहस्त्रं तु पितृन् माता गौरवेणातिरिच्यते ।।"*     ( मनुस्मृति २/१४५) 🔹 अर्थ -दश उपाध्यायों के बराबर एक आचार्य , सौ आचार्यों के तुल्य एक पिता, एक हजार पिताओं के तुल्य माता उत्तम है । 2- *दशपुत्रसमा कन्या दशपुत्रान्प्रवर्धयन्।* *यत्फलं लभते मर्त्यस्तल्लभ्यं कन्ययैकया॥* 🔹अर्थ - अकेली कन्या ही दश पुत्रों के समान है। दश पुत्रों के लालन पालन से जो फल प्राप्त होता है वह अकेले कन्या के पोषण से ही प्राप्त हो जाता है। 3- *यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।* *यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः*।।५६।। 🔹जहां स्त्री जाति का आदर-सम्मान होता है, उनकी आवश्यकताओं-अपेक्षाओं की पूर्ति होती है, उस स्थान, समाज, तथा परिवार पर देवतागण प्रसन्न रहते हैं । जहां ऐसा नहीं होता और उनके प्रति तिरस्कारमय व्यवहार किया जाता है, वहां देवकृपा नहीं रहती है और वहां संपन्न किये गये कार्य सफल नहीं होते हैं । 4- *शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्...

दीपावली

*जीवन की पांच महत्वपूर्ण बातों के महत्व को ध्यान दिलाने वाला महापर्व दीपावली* दीपावली महोत्सव धनतेरस से शुरू होकर भाई दूज तक चलता है। इन 5 दिनों के त्योहारों में पहले दिन आयुर्वेद और औषधियों के देवता धनवंतरि की पूजा की जाती है। दूसरे दिन यानी चतुर्दशी तिथि पर धर्मराज यम की पूजा और दीपदान किया जाता है। इसके अगले दिन यानी कार्तिक माह की अमावस्या पर लक्ष्मीजी की पूजा के साथ दीपावली मनाई जाती है। दिवाली के दूसरे दिन यानी प्रतिपदा तिथि पर गोवर्धन पूजा होती है। इसके अगले दिन यानी द्वितिया को भाई-दूज के त्योहार के साथ ही दीपावली महोत्सव पूरा हो जाता है।   *दीपावली महाेत्सव क्यों* 5 दिनों तक चलने वाले दीपावली महोत्सव मनाने का कारण ये है कि हर व्यक्ति को जीवन की 5 महत्वपूर्ण बातें पता हो। इस महोत्सव का हर दिन जीवन की एक महत्वपूर्ण बात समझाता है। इस महोत्सव में सेहत, मृत्यु, धन, प्रकृति, प्रेम और सद्भाव का संदेश छुपा है। ये 5 जरूरी बातें जीवन को पूर्ण बनाती हैं। दीपावली पर्व पर लक्ष्मी पूजा सिर्फ धन और सोना-चांदी प्राप्ति की भावना से न की जानी चाहिए।  लक्ष्मी का मतलब रुपया, पैसा, स...

महर्षि वाल्मीकि

*आदि कवि भगवान वाल्मीकि जी के प्रकट दिवस पर हार्दिक शुभकामनाये।*   अश्विन मास के शुक्‍ल पक्ष की पूर्णिमा यानी कि शरद पूर्णिमा को आदि काव्‍य रामायण के रचयिता और संस्‍कृत भाषा के परम ज्ञानी महर्षि वाल्‍मीकि का जन्म ऋषि कश्यप और माता अदिति के नौवें पुत्र वरुण और उनकी पत्नी माता चर्षणी के घर हुआ था। जब महर्षि वाल्‍मीकि ने रचा संस्‍कृत का पहला श्‍लोक -- महर्षि वाल्‍मीकि ने संस्‍कृत साहित्‍य के पहले श्‍लोक की रचना की थी. संस्‍कृत साहित्‍य का यह पहला श्‍लोक रामायाण का भी पहला श्‍लोक बना. ज़ाहिर है रामायण संस्‍कृत का पहला महाकाव्‍य है. हालांकि इस पहले श्‍लोक में श्राप दिया गया था. इस श्राप के पीछे एक रोचक कहानी है. दरअसल, एक दिन वाल्मीकि स्‍नान के लिए गंगा नदी को जा रहे थे. रास्‍ते में उन्हें तमसा नदी दिखी. उस नदी के स्‍वच्‍छ जल को देखकर उन्‍होंने वहां स्‍नान करने की सोची.  तभी उन्होंने प्रणय-क्रिया में लीन क्रौंच पक्षी के जोड़े को देखा. प्रसन्न पक्षी युगल को देखकर वाल्मीकि ऋषि को भी हर्ष हुआ. तभी अचानक कहीं से एक बाण आकर नर पक्षी को लग गया. नर पक्षी तड़पते हुए वृक्ष से गिर गया. मा...

महा कवि वाल्मिकी जी

महाकवि  ऋषि वाल्मीकि  जी के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं... अपने घर पर प्रतिदिन पर उनकी द्वारा रचित श्री रामायण जी का अध्ययन कर अपने धर्म की रक्षा करें.. एक बार सभी ऋषि मिलकर ब्रहमऋषि विश्वामित्र जी की स्तुति करने लगे और कहने लगे महाराज आपसे ज्ञानवान कोई नहीं आप सर्वश्रेष्ठ है ! इस पर विश्वामित्र जी बोले मैंने ऐसा कोई काम नहीं किया कि आप सब मुझे श्रेष्ठ कहे ! विश्वामित्र जी के वचन सुनकर सभी ऋषियों ने कहा हे ब्रहमऋषि जिस राम का सारी सृष्टि ध्यान करती है वह रामजी भी आपके शिष्य है इसलिए आप श्रेष्ठ है ! यह सुनकर विश्वामित्र जी ने संत सभा में बैठे ऋषि वशिष्ट जी की तरफ इशारा कर कहा , मुझमें ऐसा कोई गुण नहीं कि रामजी मेरे शिष्य बने यह सब वशिष्ट जी की कृपा है यदि वसिष्ठ जी उन्हें मेरे पास न भेजते तो वह मुझे गुरु कभी स्वीकार न करते इसलिए वह ही सर्वश्रेष्ठ है ! विश्वामित्र जी के ऐसे वचन सुनकर वशिष्ट जी ने कहा हे ऋषियों विश्वामित्र केवल मुझे सम्मान देने के लिए ऐसा कह रहे है , श्रेष्ठ तो महाऋषि वाल्मीकि जी है जिन्होंने राम जन्म से हजारो वर्ष पहले रामायण की रचना कर दी !    ...

श्री हनुमानजी

प्रिय मित्र,  आज मंगलवार है अपने मुहल्ले के मन्दिर में सत्संग के समय यह प्रसंग सुनाए  *हनुमान जी का कर्जा ....11* रामजी लंका पर विजय प्राप्त करके आए तो, भगवान ने विभीषण जी, जामवंत जी, अंगद जी, सुग्रीव जी सब को अयोध्या से विदा किया।  सब ने सोचा हनुमान जी को प्रभु बाद में बिदा करेंगे, लेकिन रामजी ने हनुमानजी को विदा ही नहीं किया, अब प्रजा बात बनाने लगी कि क्या बात सब गए हनुमानजी नहीं गए अयोध्या से ! अब दरबार में काना फूसी शुरू हुई कि हनुमानजी से कौन कहे जाने के लिए, तो सबसे पहले माता सीता की बारी आई कि आप ही बोलो कि हनुमानजी चले जाएं।        माता सीता बोलीं मै तो लंका में विकल पड़ी थी, मेरा तो एक एक दिन एक एक कल्प के समान बीत रहा था, वो तो हनुमानजी थे, जो प्रभु मुद्रिका ले के गए, और धीरज बंधवाया कि.....मै तो अपने बेटे से बिल्कुल भी नहीं बोलूंगी अयोध्या छोड़कर जाने के लिए, आप किसी और से बुलावा लो।      अब बारी आयी लखनजी की तो लक्ष्मण जी ने कहा, मै तो लंका के रणभूमि में वैसे ही मरणासन्न अवस्था में पड़ा था, पूरा रामदल विलाप कर रहा था। ये जो ख...