महान क्रांतिकारी वीर सावरकर

देशहित में जेलों की क्रूर यातनाओं के शिकार क्रान्तिकारी '#वीर_सावरकर बन्धु' की जयंती पर कोटिश: नमन व श्रद्धांजलि।
50 वर्ष की काले पानी की सजा पाने वाले वीर सावरकर बंधु की जुबानी - दिल दहलाने वाले कुछ किस्से उन्हीं की आत्मकथा से 👇🥲
#अण्डमान_जेल_का_भोजन 🥲
अधपका चावल-जली रोटियां -भोजन में सबसे बड़ी कमी यह रहती थी कि उसे तैयार करते समय लापरवाही बरती जाती थी। चावल अधपका होता तो रोटी अधसिकी या आधी जली। कभी-कभी तो रोटी की जगह मानो कच्चा आटा ही सामने रख दिया गया हो। जेल के रसोइये अत्यन्त गन्दे रहा करते थे। उनके कपड़े पसीने से तर रहा करते थे। गर्मी में जब वे भोजन बनाते होते तो उनके मस्तक से निकली पसीने की बूंदे दाल या आटे में गिरती दिखाई देती। वे प्रायः संक्रामक रोग से पीड़ित रहा करते।"

#सब्ज़ी_में_मिट्टी_का_तैल
कई बार भोजन में दी जाने वाली कांजी में मिट्टी का तैल पड़ा मिलता। दुर्गन्ध आती तो पता चलता। होता यह था कि बड़ी हांडी में कांजी पड़ती थी। वह हांडी चूल्हे पर चढ़ी होती। पकते समय उसे देखने के लिए रसोइया मिट्टी के तैल का दीया लेकर उसमें झांकता। दीया टेड़ा हो जाता और मिट्टी का तैल उस हांडी में गिर जाता।"
🥺#सब्ज़ी_में_सांप_और_केंचुली
अण्डमान में दो फुट लम्बी तथा अत्यन्त विषैली केंचुली बहुत होती थी। सवेरे बन्दी जंगल से सब्जी लेने भेज दिये जाते थे। वे हाथों में हँसिया लेकर जंगलों में घुस जाते और ढेर की ढेर सब्जियां काटकर, पत्तीदार शाक काटकर गाड़ियों में भरकर जेल ले आते। उन्हें जूड़ियों में बांधकर, काटकर पकने के लिए हडियों में डालकर चूल्हों पर चढ़ा दिया जाता था। उन्हें बीनने, साफ करने या धोने की कोई आवश्यकता नहीं समझी जाती थी।
कई बार भोजन करते समय सब्जी में कभी केचुली का टुकड़ा हाथ में आ जाता तो कभी-कभी सांप तक के शरीर की बोटी दिखाईदे जाती। मैंने तथा कुछ अन्य बन्दियों ने जब सब्जी में केंचुली और सांप का टुकड़ा उठाया और उसे दिखाने सुपरिण्टेण्डेण्ट या बारी के पास ले गए तो वे हंसकर कह देते "इनका स्वाद तो बहुत अच्छा होता है।" कई बार केंचुली या सांप का टुकड़ा निकलने पर या तो उन्हें निकालकर बाकी सब्जी से रोटी खानी ही पड़ती या सब्जी फेंककर सूखी रोटी चबानी पड़ती।
#तेल_की_घानी👇
राजबन्दियों को अलग-अलग बैरकों में अकेले-अकेले रखा गया। उनकी  बातचीत अब हथकड़ी या बेड़ी की सजा पाती। स्नान के हौद पर या भोजन करते समय यदि कोई इशारे से भी कुशल-क्षेम पूछता देख लिया जाता, तो सात-सात दिन दण्डा बेड़ी पहने खड़े रहने की सजा रसीद हो जाती। उन सुशिक्षित राजबन्दियों से अब छिलका कुटाई का काम लेना पक्षपात माना जाने लगा तथा उन्हें तैल के कोल्हू चलाने का काम सौंप दिया गया जो बैल के ही योग्य माना जाता है तथा जेल का सबसे कठिनतम मशक्कत का कार्य माना जाता है।
सवेरे उठते ही लंगोटी पहनकर कमरे में बन्द हो जाना तथा अन्दर कोल्हू का डण्डा हाथ से घुमाते रहना। कोल्हू में नारियल की गरी के पड़ते ही वह इतना भारी चलने लग जाता कि कसे हुए शरीर के बन्दी भी उसकी बीस फेरियां करते रोने लग जाते। बीस-बीस वर्ष तक की आयु के चोर-डाकुओं तक को इस भारी मशक्कत के काम से वंचित  कर दिया जाता किन्तु राजबन्दी चाहें वह किसी भी आयु का हो उसे यह कठिन व कष्टतर कार्य करने से अण्डमान का वैद्यक शास्त्र भी नहीं रोक पाता। कोल्हू के उस डण्डे को हाथों से उठाकर आधे रास्ते तक चला जाता और उसके बाद का अर्ध गोला पूरा करने के लिए डण्डे पर लटकना पड़ता, क्योंकि हाथों में बल नहीं रहता था। तब कहीं कोल्हू की गोल दांडी पूरा चक्कर काटती। बीस वर्ष तक आयु के वे सब कोमल राजबन्दी कष्टों से अपरिचित परन्तु सुशिक्षित थे। सवेरे दस बजे तक लगातार कोल्हू के चक्कर लगाने से भारी हो जाती और प्रायः सभी को चक्कर आ जाता। कोई-कोई तो पसीने से लथपथ होकर बेहोश तक हो जाते। नियमानुसार दस बजेकाम बन्द कर दिया जाता दो घण्टे के लिए। परन्तु कोल्हू का काम निरन्तर का था। भोजन आते ही दरवाजा खुल पड़ता। बन्दीवान भात. रोटी व सब्जी लेकर, थाली भर लेता और उसके अन्दर जाते ही दरवाजा बन्द। यदि कोई बन्दी पसीने से तर शरीर को साफ करते रहने या हाथ-पैर धोते रहने के कारण एकाध मिनट विलम्ब कर देता, तो जेल वार्डर उसे जोर-जोर से मां-बहन की गन्दी गालियां देने लगता। जहाँ पीने के पानी के लिए आग्रह करना पड़ता वहाँ हाथ धोने के लिए पानी कहां से मिले?
कोल्हू में काम करते-करते भीषण प्यास लगने लगती पानी वाला पानी देने से इन्कार कर देता। यदि किसी को तम्बाकू खिला दी तो पानी मिल जाता। जमादार से पानी के लिए कहा जाता तो उसका उत्तर होता- 'कैदी को दो कटोरी पानी देने का हुक्म है, तुम तो तीन पी गये। और पानी क्या तुम्हारे बाप के घर से लायें' पानी पीना या हाथ धोना जहां इतना दुश्वार था वहां स्नान के लिए पानी कहां?
👉जिसे पढ़ते हुए भी डर लगे उसे जीना और झेलना कैसा होगा आज इन्हीं लोगों के बलिदान पर हम आजाद भारत की सुखी नागरिक हैं।
देखिए अंग्रेजी साम्राज्यवाद के विरुद्ध देश-विदेश में प्रचार करने, आजादी सम्बन्धी कविताएं एवं साहित्य लिखने और उन्हें प्रकाशित कराने, क्रान्ति के सूत्रधार होने तथा अंग्रेज़ी शासन को उखाड़ के अपराधों में संलिप्त मानने के कारण अंग्रेज़ों ने दो बड़े भाइयों को काले पानी की सजा दी। विनायक सावरकर को तो खतरनाक क्रान्तिकारी मानकर ५० वर्ष की सजा दी गयी। कालेपानी की जेल में उनके साथ पशुओं से भी बुरा व्यवहार किया गया, क्रूर यातनाएं दी गयीं, तिल-तिल करके शरीर को जीर्ण-शीर्ण कर दिया गया। सावरकर ने अपनी आत्मकथा में उन घृणित, क्रूर एवम् अमानुषिक यातनाओं का विवरण दिया है, जिन्हें पढ़कर आज भी पाठकों की रूह कांप जाती है।
नमन🙏🏼🙏🏼 है ऐसे वीर बलिदानी महापुरुष को

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