मकर संक्रांति
*राष्ट्र जीवन में भी घटे मकर संक्रांति*"
*नवोनमेष की शुभ वेला में लेकर दृढ़ विश्वास चलें* ,
*समय आ गया चलें देश का फिर स्वर्णिम इतिहास रचें* " जानिए मकर संक्रांति के कुछ महत्वपूर्ण तथ्य ।
*आज ही के दिन से भगवान सूर्य नारायण दक्षिणायन से उत्तरायण हो जाते हैं , इसी दिन से साधना का सिद्दिकाल आरंभ हो जाता है* ।
*महाभारत में भीष्म पितामह ने इसी दिन स्वेच्छा से अपने शरीर का परित्याग किया था* ।
*सूर्य की सातवीं किरण भारत वर्ष में आध्यात्मिक उन्नित की प्रेरणा देने वाली है । इसी कारण ही प्रयाग में माघ मेला , पूर्ण कुंभ या अर्द्धकुंभ के विषेश उत्सव का आयोजन होता है* ।
*रामायण काल से भारतीय संस्कृति में सूर्य पूजा का प्रचलन चला आ रहा है । श्रीराम जी भी नित्य सूर्य पूजा करते थे । श्रीरामचरितमानस में श्रीराम जी का पतंग उडाने का उल्लेख भी मिलता है* ।
*कपिल मुनि के आश्रम पर जिस दिन मातु गंगे का पदापर्ण हुआ था वह मकर संक्रांति का ही दिन था । पावन गंगा जल के स्पर्श मात्र से राजा भागीरथ के पुत्रों को स्वर्ग की प्राप्ति हुई थी* ।
*राजा भागीरथ ने अपनी भागीरथ तप साधना के परिणामस्वरुप पापनाशिनी गंगा को पृथ्वी पर लाकर अपने पूर्वजों को मोक्ष प्रदान करवाया था । उन्होनें अपने पूर्वजों का गंगाजल , अक्षत , तिल से श्राद्ध तर्पण किया था । तब से माघ मकर संक्रांति स्नान और मकर संक्रांति श्राद्ध तर्पण की प्रथा आज तक प्रचलित है* ।
*संक्रान्ति पर्व है नव संचार का , पर्व है नव करवट का , पर्व है आपस में बैठकर खिचड़ी खाने का यानि जाति - पाति से मुक्त " समरसता " का । आज ही के शुभ दिन प्राण त्यागने इच्छा लिए भीष्म पितामह शर शैय्या पर लेटे रहे , आज ही के दिन से दिनों में भी परिवर्तन होना शुरू हो जाता है । संक्रान्ति काल है भारत के बढ़ते प्रादुर्भाव का , परमात्मा से यह कृपा माँगने का कि हे प्रभु सारा संसार , प्रत्येक जीवात्मा सुख और प्रेम से भरी रहे यही इस संक्रान्ति का संदेश है* । "
*संक्रांति प्रतीक है परिवर्तन का, सामाजिक समरसता का, एकता व बंधुत्व का। तिल गुणवान हैं परंतु गुड़ के बिना बेस्वाद, जिनको खाया नहीं जा सकता। घी डलते ही खिचड़ी की गुणवत्ता दोगुनी हो जाती है। गुड़ के बिना तिल का महत्त्व नहीं और घी के बिना खिचड़ी अधूरी, समाज में दूसरे के बिना मैं अधूरा, इसी तरह मैं भी किसी का पूरक। एक-दूसरे का महत्त्व समझते हुए समाज में समरस हो कर रहना संदेश है मकर संक्रांति का। आज जब देश में सामाजिक एकता के ताने बाने को छिन्न-भिन्न करने का प्रयास चल रहा है, जातिवाद, सांप्रदायिकता के नाम पर एक वर्ग को दूसरे से लड़ाने के प्रयास हो रहे हैं तो समरस, सरस और सर्वसमाज समभाव का संदेश लेकर आ रही है मकर संक्रांति*।
*मकर संक्रांति में 'मकर' शब्द मकर राशि को इंगित करता है जबकि 'संक्रांति' का अर्थ संक्रमण अर्थात प्रवेश करना है। मकर संक्रांति के दिन सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है। एक राशि को छोड़कर दूसरे में प्रवेश करने की इस विस्थापन क्रिया को संक्रांति कहते हैं। चूंकि सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है इसलिए इस समय को मकर संक्रांति कहा जाता है। भारीतय पंचांग के महीने के अनुसार पौष शुक्ल पक्ष में मकर संक्रांति पर्व मनाया जाता है। जैसे चन्द्रमास के 2 भाग हैं- कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष। इसी तरह सौरवर्ष के आधार पर वर्ष के 2 भाग हैं- उत्तरायन और दक्षिणायन। इस दिन से सूर्य उत्तरायन हो जाता है। उत्तरायन अर्थात उस समय से धरती का उत्तरी गोलाद्र्ध सूर्य की ओर मुड़ जाता है, तो उत्तर ही से सूर्य निकलने लगता है। 6 माह सूर्य उत्तरायन रहता है और 6 माह दक्षिणायन। अत: यह पर्व 'उत्तरायन' के नाम से भी जाना जाता है*। *शुभ संक्रांति*