भारत का गौरवशाली इतिहास-154 कुशल सिंह दाहिया
भारत का गौरवशाली इतिहास -154 कुशल सिंह दाहिया
हिन्दू वीर दादा कुशाल सिंह दहिया, जिन्होंने अपना शीश देकर, गुरू तेग बहादुर जी के शीश की रक्षा की। सनातन हिन्दू धर्म न छोड़ने व अरब का कबिलाई मजहब इस्लाम स्वीकार न करने पर इस्लामिक पिशाच औरंगजेब ने संत सतीदास, संत मतीदास और संत दयाला जी की नृशंश यातना देकर हत्या कर दी।
24 नवम्बर को औरंगजेब ने संत त्याग मल, जिन्हें बाद में गुरू तेगबहादुर जी के नाम से पुकारा गया, का भी शीश कटवा दिया और उनके पवित्र पार्थिव शरीर का अपमान करने के लिए शरीर के चार टुकड़े कर के उसे दिल्ली के चारों बाहरी गेटों पर लटकाने का आदेश दे दिया।
लेकिन उसी समय अचानक आये अंधड़ का लाभ उठाकर एक स्थानीय हिन्दू व्यापारी लक्खीशाह, गुरू त्याग मल जी का धड और संत जैता जी गुरु जी का शीश उठाकर ले जाने में सफल हो गए। लक्खीशाह ने गुरु जी के धड़ को अपने घर में रखकर अपने घर को आग लगा दी। इस प्रकार समझदारी और त्याग से गुरु जी के शरीर का अपमान होने से बचा लिया।
इधर संत जैता जी ने गुरूजी का शीश उठा लिया और उसे कपडे में लपेटकर अपने कुछ साथियों के साथ आनंदपुर साहब को चल पड़े. इस्लामिक पिशाच औरँगेजेब ने उनके पीछे अपनी सेना लगा दी और आदेश दिया कि किसी भी तरह से गुरु जी का शीश वापस दिल्ली लेकर आओं। संत जैता जी किसी तरह बचते बचाते सोनीपत के पास बढ़खालसा गाँव में पहुंचे गए।
मुगल सेना भी उनके पीछे लगी हुई थी. वहां के स्थानीय निवासियों को जब पता चला कि - संत त्याग मल जी ने अपने पवित्र सनातन हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए आत्म बलिदान दे दिया है और उनका शीश लेकर उनके शिष्य उनके गाँव में आये हुए हैं तो सभी गाँव वालों ने उनका स्वागत किया और शीश के दर्शन किये. दादा कुशाल सिंह दहिया को जब पता चला तो वे भी वहां पहुंचे, और गुरु जी के शीश के दर्शन किये।
मुगलों की सेना भी गांव के पास पहुंच चुकी है. गांव के लोग इकट्ठा हुए और सोचने लगे कि क्या किया जाए ? मुगल सैनिको की संख्या और उनके हथियारों को देखते हुए गाँव वालों द्वारा प्रतिकार करना भी सरल नहीं था. सबको लग रहा था कि मुगल सैनिक गुरु जी के शीश को आनन्दपुर साहिब तक नहीं पहुंचने देंगे. अब क्या किया जाए ?
तब "दादा कुशाल सिंह दहिया" ने आगे बढ़कर कहा कि - सैनिको से बचने का केवल एक ही रास्ता है कि - गुरूजी का शीश मुगल सैनिको को सौंप दिया जाए। इस पर एक बार तो सभी लोग गुस्से से "दादा" को देखने लगे। लेकिन दादा ने आगे कहा - आप लोग ध्यान से देखिये गुरु जी का शीश, मेंरे चेहरे से कितना मिलता जुलता है।
अगर आप लोग मेरा शीश काट कर, उसे गुरु त्याग मल जी का शीश कहकर, मुगल सैनिको को सौंप देंगे तो ये मुघल सैनिक शीश को लेकर वापस लौट जायेंगे. तब गुरु जी का शीश बड़े आराम से आनंदपुर साहब पहुँच जाएगा और उनका सम्मान के साथ अंतिम संस्कार हो जाएगा. उनकी इस बात पर चारों तरफ सन्नाटा फ़ैल गया।
सब लोग स्तब्ध रह गए कि - कैसे कोई अपना शीश काटकर दे सकता है ? पर हिन्दू वीर कुशाल सिंह निर्णय कर चुके थे, उन्होंने सबको समझाया कि - गुरू त्यागमल को हिन्द की चादर कहा जाता हैं, उनके सम्मान को बचाना हिन्दू का सम्मान बचाना है। इसके अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं है। फिर दादा कुशाल सिंह ने अपना सिर कटवाकर गुरु शिष्यो को दे दिया।
जब मुगल सैनिक गाँव में पहुंचे तो त्याग मल के शिष्य दोनों शीश को लेकर वहां से निकल गए। संत जैता जी गुरु जी का शीश लेकर तेजी से आगे निकल गए औए जिनके पास दादा कुशाल सिंह दहिया का शीश था, वे जानबूझकर कुछ धीमे हो गए, मुगल सैनिको ने उनसे वह शीश छीन लिया और उसे गुरु त्याग मल जी का शीश समझकर दिल्ली लौट गए।
इस तरह धर्म की खातिर बलिदान देने की भारतीय परम्परा में एक और अनोखी गाथा जुड़ गई। जहाँ दादा वीर कुशाल सिंह दहिया ने अपना बलिदान दिया था उसे "गढ़ी दहिया" तथा "गढ़ी कुशाली" भी कहते हैं। सदियों से इतिहासकारों, हिन्दू संगठनों, सिक्ख संगतों और सरकारों ने "हिन्दू वीर दादा वीर कुशाल सिंह दहिया" तथा इस स्थान को कोई महत्त्व नहीं दिया।
अब हरियाणा सरकार के मुख्यमंत्री श्री मनोहरलाल खट्टर जी ने उस स्थान पर एक संग्राहलय बनवाया हैं और वहां पर महा बलिदानी दादा कुशाल सिंह दहिया (कुशाली) की प्रतिमा को स्थापित किया है. यह स्थान सोनीपत जिले में बढ़खालसा नामक स्थान पर है। सभी धर्मप्रेमियों को वहां दर्शन के लिए जाना चाहिए।
साभार - विश्वजीत जी