विजयादशमी
आप सभी को अधर्म पर धर्म की विजय के प्रतीक दशहरा व सामाजिक कार्य में रत संगठन "राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ " के स्थापना दिवस की हार्द्विक बधाई ।
दशहरा पर्व भगवान राम के कार्यों को स्मरण करने व उन पर चलने का दिन है । मर्यादा पुरूषोत्तम राम ऐसे राष्ट्र निर्माता भी हैं जिन्होंने संस्कृति और इतिहास के घुमावदार रास्तों को सीधा करने का काम अदभुत तरीक़े से किया ।
श्रीराम मर्यादाओं की स्थापना करने वाले हैं । वह स्वयं से नहीं , बल्कि सर्व समाज से सभी की ( जाति - वर्णों ) की स्वीकार्यता चाहते हैं । श्रीराम विभिन्न जातियों समूहों को एक सूत्र में जोड़ते व पिरोते चलते हैं ।
अनेकता में एकता की राष्ट्रीय धारणा के आदि पुरूष श्रीराम हैं । श्रीराम राष्ट्र नायक हैं और निर्बलों को सत्ता का अधिकार देने वाले भी । वह आर्य भी हैं और द्रविड़ भी शैव भी हैं और वैष्णव भी । वस्तुत: इसीलिए वह आदर्श मर्यादा पुरूषोत्तम हैं । उन्होंने आदर्शो की स्थापना के लिए अनगिणत त्याग किए और वह भी कर्तव्य भाव से । इसीलिए वह कर्तव्य पथ के महानायक भी हैं और जन - जन के उद्धारक भी ।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने 95 वर्ष पूरे किए हैं । लेकिन 95 वर्षों में ही संघ ने राष्ट्र की युवा शक्ति को एकजुट कर राष्ट्रहित में न्योछावर होने के जो सूत्र प्रदान किए हैं वे सूत्र अब राष्ट्र के लिए वरदान बन चुके हैं । आज विजयादशमी पर पूजनीय सरसंघचालक जी ने जो भी कहा , उसमें राष्ट्र के ठोस व दूरगामी सिद्धांतों की अनुगूँज स्पष्ट रूप से सुनाई देती है ।
अच्छी बुरी हर परिस्थिति में पुरज़ोर संघर्ष करते हुए राष्ट्र विकास और सम्मान कैसे प्राप्त करें , उसके सूत्र इस उदबोधन में थे । न सफलता का अहंकार है और न असफलता से निराशा सिर्फ़ अंतिम व्यक्ति के उत्थान का ही संकल्प संघ लिए हुए है ।
युद्ध , दुर्घटना , हादसा और आपदा हर संकटकालीन घड़ी में मानवता को जिलाने का अभूतपूर्व योगदान संघ के संबल से ही संभव हुआ है । संघ के कितने भी आलोचक हों या उसकी कितनी भी आलोचनाएँ हों पर राष्ट्र के सत्यपथ पर अग्रसर स्वयंसेवकों का पथ संचलन न रूकने वाला है , न डिगने वाला । " भारत माता की जय "