*भारत का गौरवशाली इतिहास - 114 ,**गोस्वामी तुलसीदास जी एक कुशल संगठक।*

*भारत का गौरवशाली इतिहास - 114 ,*
*गोस्वामी तुलसीदास जी एक कुशल संगठक।*

अखाड़े तथा हनुमान मन्दिर- उत्तर भारत में गोस्वामी #तुलसीदास घूमघूमकर तरुण युवकों के लिए अखाड़े प्रारम्भ करते हैं तथा जातिगत भेदभाव भूलाकर उन अखाडों पर युवकों का समूह खड़ा कर देते हैं । इस प्रकार, सम्पूर्ण उतर-भारत में अखाड़ों की धूम  मच गई। लाखों युवक बलोपासना में लग गए | अखाड़ों में तथा ग्राम-ग्राम में वे हनुमान मन्दिर की स्थापना करवाते हैं।   
          ‘तुलसी’ पर शोध प्रबन्ध लिखने वाले प्राध्यापक रमेश कुन्तल ‘मेघ’ कहते हैः “काशी में अनेक हनुमान- मन्दिरों के अलावा जनश्रुतियों के अनुसार कसरतकुश्ती के अखाड़ों में भी संत तुलसीदास की प्रेरणा से ही हनुमान् की मूर्तियाँ स्थापित करने में सफल  रहे..सरल भाषा में #हनुमान_चालीसा' लिखने के कारण वह पूरे भारत में लोकप्रिय हो गया, हनुमान सभी जातियों के भगवान् हो गए। काशी के अन्दर ग्यारह हनुमान मन्दिरों की स्थापना तुलसीदास ने स्वयं की।
         रामलीला का आयोजन- तुलसीदास के प्रयासों से रामलीला का प्रथम आयोजन काशी में हुआ। हजारों लोगों के सहयोग से रामलीला होती है। स्थान-स्थान पर अखाड़ों में कसरत करने वाले हजारों युवक राम की सेना तथा रावण की सेना के विविध पात्र बन कर रामलीला में भागीदारी का निर्वाह करते हैं। 
        रामलीला के पात्र ‘श्रीरामचरितमानस की चौपाइयों को कण्ठस्थ करते हैं। सभी जातियों के लोग इन रामलीलाओं में भाग लेते हैं। सभी एक ही नारा लगाते हैं , 'बोलो ! राजा रामचन्द्र की जय।' हिन्दू का राजा राम ही है यह विश्वास जन-मानस में वे भर देते हैं । उस कठिन काल में जब 'दिल्लीश्वरोवा-जगदीश्वरोवा' का नारा लगता था तब भव्यता के साथ राजा रामचन्द्र जी का राज्याभिषेक करवाकर हिन्दू समाज के मन में आत्मविश्वास भरने का काम तुलसीदास करते हैं। 
       इस प्रकार गोस्वामी तुलसीदास ने पूरे उत्तर भारत में रामलीला का मंचन करने वाली टोलियों को काशी में प्रशिक्षित कर स्थान-स्थान पर भेजने का व्यापक कार्य अपने हाथ में ले लिया और देशभर में रामलीलाएँ प्रारम्भ हो गईं। हिन्दू समाज के अन्दर अपनी स्वतन्त्रता हेतु वे युद्ध का मानस तैयार करते हैं। नैतिक बल से परिपूर्ण राम की सेना रावण की विशाल ससन्जित सेना पर स्थानीय अल्पशस्त्रों के बावजूद विजय पा जाती है। 
        'मानस' में वे मुष्टियुद्ध, गदायुद्ध, रथयुद्ध, मल्लयुद्ध, शक्तियुद्ध, वृक्षयुद्ध, पाषाणयुद्ध आदि अनेक प्रकार के युद्धों का रोमांचकारी वर्णन करते हुए राम को विजयी बनाते हैं। इस प्रकार पराजित, निराश हिन्दू समाज में सभी जाति-वर्गों के युवकों को शस्त्र, युद्ध और विजय का दर्शन प्रदान करते हैं। करोड़ों हिन्दुओं का हृदय, उत्साह, आनन्द एवं अध्यात्म प्रेरित-आत्मविश्वास से भर गया।

*#तुलसीदास_जयंती  #रामचरितमानस   #रामचरित_मानस*

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