भारत का गौरवशाली इतिहास -108, हमारे आदर्श भगवान राम क्यों है ??? आइए! जाने।
*भारत का गौरवशाली इतिहास -108*
*हमारे आदर्श भगवान राम क्यों है ??? आइए! जाने।*
सामाजिक दर्शन; जीवन के मौलिक सिद्धांतों तथा धारणाओं की व्याख्या का स्वरूप है तथा सामाजिक संबंधों के सर्वोच्च आदर्शों का निरूपण करता है| भारतीय संस्कृति में सामाजिक दर्शन के प्रमुख प्रणेता प्रभु श्रीराम ही हैं | समाज में समानता के भाव को दशा और दिशा उन्होंने ही दी समाज के सभी वर्गों को समानता की दृष्टि से देखते हुए समाज को उन्नत करने का कार्य किया |
गुरुकुल में रहते हुए स्वयं को कभी कुलश्रेष्ठ नहीं माना | गुरु तथा गुरु माता की सेवा करना, गुरु विश्वामित्र के साथ वन के लिए जाना तथा आश्रम को भयमुक्त वातावरण देना, निषादराज से अटूट मित्रता; श्रीराम उनको अपने भाई के समान मानते थे | राजा दशरथ के परिवार में निषाद राज के पिता तीर्थराज निषाद का सम्मान किया जाता था | वनवास के समय गंगा नदी पार करने वाले केवट को भी श्री राम ने पूर्ण सम्मान दिया जब उन्होंने नदी पार करके पारिश्रमिक देने की इच्छा प्रकट की तो केवट ने सविनय कहा कि जब आप अयोध्या का राज्य संभालेंगे तब मैं अवश्य अपना पारिश्रमिक लूँगा , इस बात को श्री राम ने चौदह वर्ष बाद भी याद रखा | जब उनका राज्याभिषेक हुआ तो किसी कारणवश केवट वहाँ नहीं आ सके तब श्रीराम ने निषादराज के हाथों केवट के लिए बहुमूल्य उपहार भेजें |
उनके लिए सदैव मनुष्य की प्रमुखता रही अवसर कि नहीं क्योंकि उनका मानना था कि अवसर तो आते-जाते रहते हैं परंतु संबंध और व्यक्ति आपके जीवन में स्थाई रूप से रहने चाहिए | समाज का जो वर्ग जंगलों में रहता था तथा समाज की मूल धारा से दूर था श्रीराम ने उनको भी आत्मसात किया शबरी ,निषाद राज ,केवट वानर-भालू, वनवासी आदि जनजातियों से भेंट की तथा उन्हें अपने जीवन का महत्वपूर्ण भाग बनाया |
समाज को एकता का संदेश दिया । उन्नत समाज का मूल मंत्र दिया जहाँ प्रत्येक वर्ग एक समान है | वनवास के समय भी उन्होंने जिस प्रकार वनवासियों को एकत्र कर अनेक प्रकार की विधाओं से परिचित करवाया उनके अंदर साहस, बल, इच्छाशक्ति तथा संगठन के मंत्र को संचारित किया उनके अंदर उनकी शक्ति तथा सम्मान के प्रति आत्मविश्वास को जागृत किया और इसका जीता जागता उदाहरण उनकी सेना थी जिसमें विभिन्न अस्त्र-शस्त्रों से तो नहीं परंतु मानसिक , शारीरिक तथा आत्मिक रूप से शक्तिशाली योद्धा अवश्य थे, वे संगठन की शक्ति को पहचानते थे; इसी कारण प्रत्येक युद्ध को जीत सके |
वे प्रत्येक सैनिक को शुभकामनाएँ तथा साहस का मंत्र देते थे उसके अंदर के भाव और विश्वास को जागृत करते थे क्योंकि वे जानते थे कि जब समाज के सभी वर्गों में सभी मनुष्यों में एक दूसरे के प्रति समानता का भाव जागृत होगा तब ही समाज तथा राज्य समुन्नत होगा तभी एक ऐसे राष्ट्र की परिकल्पना की जा सकती है जो एक ही विचारधारा से जुड़ा हो और एक ही दिशा में चलने के लिए सहमत हो इसी कारण रामराज्य को सामाजिक दर्शन के सबसे बड़े उदाहरण तथा श्री राम को समाजवाद के पुरोधा के रूप में के रूप में देखा जाता है |
वे सभी के साथ समान व्यवहार करते थे सदैव ही सब को उसके महत्त्व का भान करवाते थे | उनके विचार में समाज में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति की विचारधारा का समान रूप से सम्मान होना चाहिए तथा उसके मनोभावों को समझने का प्रयास होना चाहिए ताकि हम दूसरों के दृष्टिकोण से अवगत हो सकें |उनके व्यवहार में कहीं भी राजकुमार अथवा राजपुरुष होने का मान नहीं दिखता है | प्रजा के प्रति उनका व्यवहार सम्मानजनक था और वे प्रजा की बातों को सुनकर ही अपने नेतृत्व के क्षमता को बढ़ाते रहे क्योंकि उनके अनुसार जब तक समाज का प्रत्येक वर्ग तथा व्यक्ति नेतृत्व से संतुष्ट नहीं है तब तक उस नेतृत्व को कुशल नेतृत्व नहीं कहा जा सकता और व्यक्ति को भी कुशल व्यक्ति तब तक नहीं कहा जा सकता जब तक वह अपने आसपास के वातावरण को अपने व्यवहार द्वारा सकारात्मक ऊर्जा न प्रदान करता हो |
सामाजिक दर्शन के प्रचलित स्वरूप समाजवाद को लेकर बड़े बड़े आंदोलन होते हैं तथा इसके लिए बड़े-बड़े मंत्रों का प्रयोग किया जाता है , शासन सत्ता हाथ में आते ही प्रमुखता परिवर्तित हो जाती है | वही श्री राम ने समानता के अधिकार को सदा ही अपने राज्य में तथा अपनी विचारधारा में प्रमुख स्थान दिया; वे सभी के लिए समान मौलिक अधिकारों के पक्षधर थे स्थिति कोई भी हो वे कभी किसी को निराश नहीं करते थे| सब की प्रसन्नता का आधार बन उसके जीवन को समाज के समानांतर ही लाने का प्रयास करते थे |
आज समाजवाद का प्रमुखता से प्रदर्शन तो किया जाता है परंतु निजी स्वार्थों के कारण वह परिवारवाद में परिवर्तित हो गया है जो कि आधारभूत लोकतांत्रिक ढांचे के लिए जीती जागती चेतावनी बन गया है | जहां योग्यता को वरीयता न देते हुए केवल और केवल वंशवाद को बढ़ावा दिया जाता है | अतः आवश्यकता है कि सनातन के सिद्धांतों को धारण किया जाए तथा सबको समानता तथा समान अवसर का आधिकार दिया जाए | डॉ.दीप्ति शर्मा , July 10, 2022