समाजिक समरसता का केंद्र सिध्धेश्वर धाम शाहगंज

शाखा के माध्यम से समाज परिवर्तन की कहानी
उत्तर प्रदेश एक गांव शाहगंज की जुबानी

भूमिका :- अपने जन्मकाल से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शाखाओं के माध्यम से समाज जागरण एवं सामाजिक परिवर्तन का काम करता आ रहा है। 90 वर्ष की इस लंबी यात्रा में जिन सैंकड़ों-हजारों गांवों, शहरों, कस्बों में बदलाव आया है उसमें एक नाम शामिल है उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले के गांव शाहगंज का, जो स्वत: परिवर्तन के साथ-साथ आसपास के डेढ़ दर्जन गांवों के लिए भी प्रेरणास्रोत बन चुका है। इस गांव की शाखा के प्रयास से गांव में मंदिर, विद्यालय तथा समाज कल्याण के अन्य कार्य चल रहे हैं। सामाजिक समरसता की दृष्टि से मंदिर ने जातिगत भेदभाव की हर दीवार को चकनाचूर किया है। मंदिर में हर दिन हर जाति-बिरादरी के पुजारी अपनी-अपनी बारी अनुसार पूजा अर्चना करते हैं और इसी कारण यह मंदिर 365 पुजारियों वाला मंदिर के नाम से भी विख्यात होता जा रहा है।

सामाजिक समरसता की गंगौत्री :-

वैसे तो इस गांव में 1980 से ही संघकार्य शुरू हो चुका था, परंतु संघ का वर्तमान स्वरूप 1998 में अस्तित्व में आया। यहां की शाखा में 150 से 200 स्वयंसेवकों की उपस्थिति रहती रही है। गांव के लगभग हर परिवार का प्रतिनिधित्व शाखा में रहा है और सभी उत्सव बड़ी धूमधाम से मनाए जाते रहे हैं। एक दिन अवध प्रांत के सह-प्रांत प्रचारक श्री नवल किशोर जी का शाखा में प्रवास हुआ और उन्होंने स्वयंसेवकों को ग्राम विकास के कार्यों के लिए प्रेरित किया। स्वयंसेवकों ने हामी तो भर ली परंतु त्वरित रूप से कोई ऐसी योजना ध्यान में नहीं आई जिससे संघ अधिकारी की सद्इच्छा को मूर्त रूप दिया जा सके। तब एक स्वयंसेवक ने ग्राम देवता (धर्मध्वजी माता मंदिर जो कि लगभग 500 वर्ष पुराना है परंतु कई वर्षों से उपेक्षित तथा अव्यवस्थित चला आ रहा था) के मंदिर में सफाई करने का सुझाव दिया और बाकी स्वयंसेवकों ने इस सुझाव को इस तरह मान लिया जैसे कि देववाणी हो। मंदिर की साप्ताहिक अवधि से साफ-सफाई होने लगी। सफाई के बाद स्वयंसेवक थकान उतारने के लिए सामूहिक रूप से बैठने लगे और श्रीहनुमानचालीसा का पाठ करने लगे। धीरे-धीरे यह क्रम नियमित हो गया और इसमें समाज के बाकी लोगों ने भी इस पुनीत कर्म में हिस्सा लेना शुरू कर दिया, परंतु परेशानी तब आती थी जब वर्षा इत्यादि का मौसम हो। तब स्वयंसेवकों ने समाज के सहयोग से मंदिर परिसर में एक कमरे का निर्माण करवा दिया। गर्मी, सर्दी व बरसात से बचने के लिए कमरे में बैठ कर श्रीहनुमानचालीसा का पाठ व भजन-कीर्तन होने लगा।
मंदिर परिसर काफी विस्तृत था और सुझाव आया कि इस परिसर का प्रयोग सामाजिक कार्यों के लिए भी किया जाए। समय बीतने पर इस योजना ने भी कार्यरूप लिया और परिसर में धर्मध्वजी सरस्वती शिशु मंदिर का निर्माण हुआ। इस विद्यालय में वर्तमान में 8 वीं कक्षा तक की शिक्षा दी जाती है और 200 विद्यार्थी हैं। विद्यालय बनने के बाद भी परिसर में इतनी जगह थी कि अन्य सामाजिक गतिविधियां भी शुरू की जा सकती थीं। परिसर में मंदिर निर्माण का विचार आया। इसके लिए स्वयंसेवक घर-घर जाकर धनसंग्रह करने लगे और नियमित रूप से गांव के प्रत्येक घर से प्रतिदिन एक-एक रूपया एकत्रित किया जाने लगा। इसी धनसंग्रह की योजना के चलते बहुत से लोग आज भी इस मंदिर को 'एक रूपये वाला मंदिरÓ के नाम से भी पुकारते हैं। धीरे-धीरे अच्छी खासी मात्रा में धनसंग्रह हो गया और मंदिर निर्माण का कार्य भी शुरू हो गया। इस कार्य में धन की कमी, कुछ लोगों की उपहास उड़ाने की तो कुछ लोगों की विरोध करने की प्रवृति आड़े आई। परंतु चरैवेति चरैवेति के सिद्धांत पर चलते हुए स्वयंसेवकों ने अपना मन मैला नहीं होने दिया और निर्माण कार्य कभी तेज तो कभी धीमी गति से चलता रहा। तमाम तरह की बाधाओं के बावजूद जब स्वयंसेवकों ने हार नहीं मानी तो समाज का एक बड़ा वर्ग भी इस योजना में उनके साथ जुड़ गया और सहयोग करने लगा।

जब भोले बाबा गांव में आए :-

आखिर वह दिन भी आया जब मंदिर बन कर तैयार हो गया और 19 फरवरी, 2012 को महाशिवरात्रि के अवसर पर मंदिर का उद्घाटन तय हुआ। मंदिर का स्थान माँ सती से जुड़ा हुआ है और जब लोगों को पता चला कि यहां पर स्थापित होने वाला शिवलिंग अढ़ाई फीट ऊंचा व इतना ही चौड़ा और अढ़ाई क्विंटल वजन का है जो हिमाचल प्रदेश के प्रसिद्ध पूज्य संत स्वामी सूर्यनाथ ने भेंट दिया है तो लोगों के मन में मंदिर के प्रति श्रद्धा और भी बढ़ गई। इससे पूर्व मंदिर के भूमि पूजन के अवसर पर लोगों का उस समय ईश्वरीय चमत्कार से साक्षात्कार हुआ जब कलश को स्थापित करते समय बिना बादल के एक अमृतबूंद आसमान से टपकी और कलश में विराजमान हो गई। चमत्कार को देख कर लोगों के मन में खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
महाशिवरात्रि के अवसर पर विशाल आयोजन की परंपरा का प्रारंभ :-
पांच दिन चले मंदिर के उद्घाटन समारोह ने समाज जागरण के साथ-साथ समरसता फैलाने का कार्य भी किया। इसके लिए पांच दिन विभिन्न समारोह आयोजित किए गए। पहले दिन मातृ सम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसमें पूरे गांव में कलश यात्रा निकाली गई। इस कलश यात्रा में माताओं-बहनों सहित हजारों लोगों ने हिस्सा लिया। समारोह के दूसरे दिन सभी जाति-बिरादरी के शिल्पकारों, मेधावी विद्यार्थियों, समाज के विभिन्न क्षेत्रों में अनुकरणीय कार्य करने वाले लोगों को 'ग्राम गौरव पुरस्कारÓ दिया गया और शाम को विद्यालय के नन्हें-मुन्ने बच्चों ने अपना वार्षिक उत्सव प्रस्तुत किया जिसे देखने के लिए उनके माता-पिता समेत पूरा गांव उन्हें देखना पहुंचा। शेष तीन दिन रात्रि में शिव विवाह कथा करवाई गई। शाम के समय तीन घंटे होने वाली इस कथा में गांव का शायद ही कोई ऐसा परिवार होगा जिसका कोई सदस्य उपस्थित न हुआ हो। चौथे दिन हवनयज्ञ का आयोजन किया गया जिसमें सभी जाति-बिरादरी के लोगों ने पूर्णाहूति डाली। इस दौरान बहुत से परिवार ऐसे थे जो जीवन में पहली बार किसी यज्ञ अनुष्ठान में शामिल हुए। उनके चेहरों पर खुशी के जो भाव थे वह देखते ही बनते थे। एक बार तो मानो पूरे गांव ने परस्पर सभी भेदभाव भुला दिए और पूरा गांव समरस हो गया। पांचवें दिन विशाल भंडारा आयोजित किया गया। गांव के इतिहास में पिछले 100 सालों में ऐसा विशाल भंडारा किसी ने नहीं देखा था। इसमें लगभग 5 हजार से अधिक लोगों ने हिस्सा लिया। भंडारे की सारी सामग्री समाज के लोगों ने जुटाई और रसोई तैयार करने से लेकर प्रसाद वितरण व पत्तल तक उठाने की सेवा गांव के लोगों ने ही की। यह समारोह गांव का एतिहासिक समारोह बना। स्वयंसेवकों ने योजना बनाई कि इस तरह का पांच दिवसीय समारोह हर शिवरात्रि पर किया जाना चाहिए। स्वंयसेवकों की योजना व गांव के सहयोग से पिछले पांच सालों से हर महाशिवरात्रि के मौके पर यह पांच दिवसीय समारोह आयोजित किया जाता है। रोचक बात तो यह है कि यह समारोह गांव का प्रमुख समारोह बन चुका है और इसको दिखाने के लिए गांव के लोग अपने रिश्तेदारों को भी अपने पास बुलाने लगे हैं। मंदिर के निर्माण से गांव के लोगों में एकता की भावना का इस कदर संचार हुआ है कि गांव के लोग अब होली, दीवाली, दशहरा पर्व यहीं पर सार्वजनिक रूप से मनाते हैं।

365 पुजारियों की योजना कैसे बनी :- 

मंदिर बन कर तैयार हो गया और इसमें कार्यक्रम भी होने लगे, परंतु अब समस्या आई इसकी नियमित सेवा, पूजा-अर्चना व सुरक्षा की। गांव के मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र में स्थापित होने व मंदिर के कोई कपाट न होने के कारण इसकी सुरक्षा को लेकर चिंता होने लगी। स्वयंसेवकों की चिंता निराधार नहीं थी, क्योंकि इससे पूर्व वाले मंदिर में जब भी कोई पुजारी आता था तो क्षेत्र के कुछ मुस्लिमों के विरोध के चलते वह मंदिर में अधिक समय टिकता नहीं था। इन चिंताओं का निराकरण किया स्वयंसेवकों ने और वह भी शाखा पद्धत्ति से। मंदिर की सेवा, पूजा-अर्चना व सुरक्षा की जिम्मेवारी हर दिन एक परिवार को सौंपी जाने लगी। परिवार के सदस्य सुबह-सुबह मंदिर की साफ-सफाई करते, झाड़ू लगाते, परिसर को धोते। दिन भर उसी परिवार के लोग मंदिर में आते-जाते रहते। शाम के समय परिवार के लोग अपने घर से बना कर प्रसाद लाते और मंदिर में पूजा-अर्चना करते। पहले-पहले यह दायित्व स्वयंसेवक परिवारों ने संभाला और धीरे-धीरे पूरे गांव के लोग इस काम में जुट गए। आज साल के 365 दिन हर रोज एक परिवार यह जिम्मेवारी संभालता है। अब जो लोग मंदिर की सेवा से वंचित रह गए हैं वे आग्रह करते हैं कि उन्हें भी सेवा का मौका दिया जाए परंतु जिसकी बारी है वह अपनी सेवा छोडऩे को तैयार नहीं होता।

जब लोगों की थकान छूमंतर हो जाती है :- 

रात को श्रीरामचरितमानस की चौपाईयों का अर्थ सहित पाठ होता है। भगवान शिव, गणेश जी, माँ दुर्गा, हनुमानजी के साथ-साथ भारत माता की पांच आरती की जाती है। ज्ञात रहे कि मंदिर परिसर में भारत माता का अलग एक मंदिर भी स्थापित है। प्रतिदिन संध्या के समय उपस्थित रहने वाले लोगों की औसत संख्या 100 है और कभी-कभी यह संख्या सात-आठ सौ तक पहुंच जाती है। जिस परिवार की मंदिर की सेवा की बारी रहती है उस दिन वह अपने मित्रों, पहचान वालों, रिश्तेदारों को भी आमंत्रित करता है। इस कार्यक्रम से छोटे-छोटे बच्चों को पांचों आरती, अनेकों भजन व श्रीरामचरितमानस की चौपाईयां कंठस्थ हो गई हैं। हर महीने श्रीरामचरितमानस पर प्रश्नोत्तरी कार्यक्रम का आयोजन होता है जिसमें सभी लोग भाग लेते हैं। आरती के बाद भारत माता मंदिर के सामने शाखा भी लगती है तथा प्रार्थना के बाद सभी लोग प्रसाद लेकर घर जाते हैं। इस दौरान विभिन्न राष्ट्रीय, स्थानीय मुद्दों पर चर्चा होती है और समाज प्रबोधन का कार्य भी होता है। यहां हर हिंदू पर्व सामूहिक रूप से मनाने का क्रम भी शुरु हुआ है।

सामाजिक प्रभाव जो आज दिखाई देने लगा है :-

स्वयंसेवकों के प्रयास से इस गांव में शुरू हुआ विद्यालय, अनेक तरह के सेवाकार्यों तथा समरसता के प्रयासों ने अपना प्रभाव दिखाना शुरू कर दिया है। इस मंदिर से प्रेरणा लेकर आसपास के लगभग डेढ़ दर्जन गांवों में उन मंदिरों में भी शंख और घंटाल की ध्वनियां गूंजने लगी हैं जो किसी कारण बंद हो गए थे। गांव में शिवरात्रि पर्व सामूहिक पर्व बन चुका है जिसके लिए पूरा गांव जुटता है। गांव में 365 पुजारी (कार्यकर्ता) होने से परस्पर सुख-दु्ख में शामिल होने, संकट के समय संगठित होने का क्रम तेजी से बढ़ा है। गांव में सूचना देने का काम त्वरित गति से होने लगा है। समाज की संगठन शक्ति बढऩे से सामाजिक, राजनीतिक, प्रशासनिक क्षेत्र में हिन्दू समाज की पूछ पड़ताल भी बढ़ी है। समाज का एकत्रीकरण होने से सभी वर्गों में निकटता आने लगी है और जनजागरण होने से लोगों में भाईचारे के साथ-साथ आर्थिक विकास की इच्छा भी बलवति होने लगी है। व्यवसाय की दृष्टि से भी गांव में सकारात्मक परिवर्तन दिखने लगा है। हर दिन एक स्थान पर एकत्रित होने से जिन लोगों के मनों में गिले शिकवे थे वह दूर होते दिखाई देने लगे हैं जिससे आपसी झगड़े व मनमुटाव में कमी आई है।

आगामी योजनाएं जिसमें आपके सहयोग की अपेक्षा है

आगामी योजनाओं में इस पूरे क्षेत्र को भूख से मुक्त करने के लिए अन्न बैंक, गरीब बच्चों के लिए पुस्तक बैंक, सभी को निशुल्क चिकित्सा के लिए होम्योपैथिक डिस्पेंसरी, बच्चों के लिए खेलने का मैदान तथा दसवीं कक्षा तक के विद्यालय के लिए बड़े भवन का निर्माण (अभी यह विद्यालय टीन शैड के नीचे चल रहा है) का कार्य समाज के सहयोग से करने का कार्यकर्ताओं ने संकल्प लिया है। एक बार किसी अमेरिकी ने स्वामी विवेकानंद जी को बताया था कि हमारे यहां लोग रात को थक कर घर आते हैं तो शराब पी कर थकान मिटाते हैं और सुबह  तरोताजा उठ कर फिर काम पर लग जाते हैं। इस पर स्वामी विवेकानंद जी ने कहा कि भारत में लोग थक कर घर आते हैं तो रात को भजन-संध्या करते हैं। इसी बहाने एक दूसरे से मिलते और सुख-दुख, इलाके की सूचनाएं सांझा करते हैं। भजन कीर्तन हमारे लोगों में नई ऊर्जा का संचार करता है और मेल-मिलाप उन्हें भावनात्मक रूप से एक करता है। ऐसा कर उनकी दिन भर की थकान दूर हो जाती है और वे गहरी नींद में सो जाते हैं और सुबह तरोताजा हो कर अपने-अपने काम में जुट जाते हैं। स्वामी जी के इन्हीं शब्दों को कृतरूप दे रहा है गांव शाहगंज का यह मंदिर और स्वयंसेवकों का सामूहिक प्रयास।

आनंद सोनी
सह-जिला शारीरिक प्रमुख,
जिला फैजाबाद, अवध प्रांत (उत्तर प्रदेश)।
फोन. 094153-02768

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