भारत का गौरवशाली इतिहास - 77 , हिन्दू, हिंदुत्व व दर्शन -

भारत का गौरवशाली इतिहास - 77 , हिन्दू, हिंदुत्व व दर्शन -   

एक महामानव के पास बहुत बड़ा सा घर था । एक दिन उस महामानव के घर आगंतुक आने लगे; पहला आंगतुक जो आया उसने अपना परिचय दिया कि वह ईश्वर है फिर  उसने अहम ब्रम्हास्मि का घोष किया..! उसने कहा मुझे रहने के लिए एक कमरा चाहिए मगर मैं उस कमरे में अकेले रहूंगा...! महामानव ने कहा ठीक है .. आप उस कमरे में जाईये और आराम से अपनी मान्यताओं के साथ रहिये।
          तभी एक और आगंतुक आया  और उन्होंने कहा एकोहं द्वितीयो नास्ति "  मुझे रहने के लिए स्थान चाहिए मगर मैं दूसरों के साथ नहीं रहूंगा...! महामानव बोला; ठीक है आप उस कमरे में जाईये और अपनी मान्यताओं के साथ रहिये.
             फिर एक साथ 5 आगंतुक आये उन्होंने कहा "एकोहं बहुष्यामि "  ..महामानव ने उनके लिए भी एक कमरा दिया, फिर अगला आंगतुक आया उसने कहा " मैं   ना तो ईश्वर हूँ और न अनेक , क्योंकि मेरा मानना है कोई ईश्वर नहीं है " मुझे भी रहने को स्थान दो..महामानव बोला ; अवश्य आपके लिए भी स्थान आरक्षित है । वो रहा आपका कमरा..!
          फिर कुछ किन्नर भेष में आंगतुक आये उन्होंने कहा कि  ब्रम्ह की पूर्णता में जो अपूर्णता है वह मैं हूँ, हे मानव बाकी लोग मुझे मनुष्य नहीं समझते अतः उनके साथ मेरा रहना असंभव है मुझे उचित स्थान दो....महामानव बोला : हे आगंतुक..! आप यहां रहकर आचार्य का पद ग्रहण करें जिसमे आपको इन सभी लोगों को  जीवन राग और संगीत सीखाना है अन्यथा ये सिर्फ जले हुए ठूंठ रह जाएंगे...! आप आचार्यों के कक्ष में निवास करें....
            शाम हुई और सभी जब एक बड़े हाल में इकठ्ठा हुए तो अपने से विपरीत को देखकर लड़ने झगड़ने लगे और उस महामानव से एक दूसरे को हटाने के लिए बोले.. महामानव ने कहा ..! यदि किसी की इच्छा है इस भवन से निकलने की तो निकल सकता है लेकिन मैं इस भवन से किसी को भी नहीं निकालूंगा और एक बात याद रहे जो भी इस भवन से बाहर जाएगा कुछ समय बाद उसकी मृत्यु हो जाएगी..!
          पर इस भवन के अंदर रहने वाला हर कोई अमर है । कुछ समय तक एक दूसरे में मन मुटाव रहा लेकिन  थोड़ी देर बाद सब एक दूसरे में घुल मिल गए और एक दूसरे का आदर करने लगे । *वो भवन था; हिंदुत्व का , वो महामानव था; हिन्दू ,वो आगंतुक थे ; भिन्न भिन्न दर्शन!*

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