भारत का गौरवशाली इतिहास - 69 - हिन्द दी चादर, धर्म रक्षक, श्रीगुरु तेगबहादुर जी का बलिदान !!--

भारत का गौरवशाली इतिहास - 69 - हिन्द दी चादर, धर्म रक्षक, श्रीगुरु तेगबहादुर जी का बलिदान !!-- 

श्री गुरू तेगबहादुर जी सिख धर्म के नवें गुरु थे। इन्होंने सिख धर्म के प्रथम गुरु, श्री नानक जी के बताए गये मार्ग का अनुसरण किया। गुरु तेग बहादुर जी के द्वारा रचित 115 पद्य गुरु ग्रन्थ साहिब में सम्मिलित हैं। इन्होंने काश्मीरी हिन्दुओं को ज़बरदस्ती मुसलमान बनाने का विरोध किया। गुरु तेग बहादुर जी को इस्लाम स्वीकार न करने के कारण 1675 में मुगल शासक औरंगजेब ने सबके सामने लालकिले के सामने चाँदनी चौक पर उनका सिर कटवा दिया। जहां पर आज गुरुद्वारा शीश साहब (Gurudwara Shri Shish Saheb) बना दिया गया है।
         चांदनी चौक का गुरुद्वारा शीश गंज साहिब और गुरुद्वारा रकाब गंज साहिब उन घटनाओं तथा स्थानों की याद दिलाते हैं जहाँ गुरु श्री तेग बहादुर जी की हत्या पापी और कुकर्मी औरंगजेब द्वारा करवाई गयी और जहाँ उनका अन्तिम संस्कार किया गया। विश्व के इतिहास में धर्म और मानवता, आदर्शों और सिद्धांतों की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देने वालों में श्री गुरु तेग बहादुर साहब का स्थान अमर, अविस्मरणीय और अद्भुत है।
          वास्तव में गुरु तेग बहादुर जी का बलिदान न केवल धर्म पालन के लिए बल्कि संपूर्ण मानवीय सांस्कृतिक विरासत की रक्षा करने हेतु विशेष आत्मबलिदान था। धर्म इनके लिए सांस्कृतिक मूल्यों तथा जीवन विधान का नाम था। इसलिए धर्म के सत्य शाश्वत मूल्यों की रक्षा करने के लिए उनका बलि चढ़ जाना वास्तव में सांस्कृतिक विरासत और इच्छित जीवन विधान के लिए एक परम साहसिक और बहादुरी से परिपूर्ण अभियान था।
           गुरु तेग़ बहादुर जी का जन्मस्थान (जन्मस्थली) पंजाब के अमृतसर नगर में है। इनका जन्म पहली अप्रैल (1 April 1621) को हुआ था। अमृतसर का प्राचीन नाम अमृत सरोवर (Amrit Sarovar) था। गुरु तेग बहादुर जी गुरु हरगोविन्द जी के पाँचवें पुत्र थे। आठवें गुरु इनके पोते 'हरिकृष्ण राय' जी की अकाल मृत्यु हो जाने के कारण सिख समुदाय के जनमत द्वारा ये नवम गुरु बनाए गए। गुरु तेग बहादुर जी सन् ई. 1665 से लेकर सन् ई. 1675 तक सिख धर्म की गुरु गद्दी की शोभा बढ़ाई। इन्होंने गुरुद्वारा आनन्दपुर साहिब का निर्माण कराया और यह वहीं पर निवास करने लगे। इनके बचपन का नाम श्री त्यागमल था। मात्र 14 वर्ष की आयु में ही अपने पिता के साथ मुग़लों के हमले के विरुद्ध हुए युद्धों में इन्होंने अपनी वीरता का परिचय दिया।
          श्री गुरु तेगबहादुर जी की वीरता से प्रभावित होकर इनके पिताजी ने इनका नाम त्यागमल से तेग़ बहादुर रख दिया। जिसका अर्थ होता है: वह व्यक्ति जो तलवार का धनी हो (तलवार चलाने में महारत रखने वाला) जब रणभूमि में भीषण रक्तपात से गुरु तेग़ बहादुर जी के वैरागी मन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा तथा इनका मन आध्यात्मिक चिंतन मनन की ओर उन्मुख हुआ। धैर्य, वैराग्य तथा त्याग और बलिदान की मूर्ति गुरु तेग़ बहादुर जी ने अपना जीवन एकांत में लगातार 20 वर्षों तक 'बाबा बकाला' नामक स्थान पर साधना करते हुए बिताया। आठवें गुरु हरकिशन जी ने अपने उत्तराधिकारी के नाम के लिए 'बाबा बकाले' का निर्देश दिया था। *आइए ! उनके बलिदान दिवस पर पंजाब में चल रही धर्मान्तरण की आंधी को रोकने का संकल्प लें।*

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