भारत का गौरवशाली इतिहास - 65 , प्रकृति और हिंदुत्व ---2 :-
भारत का गौरवशाली इतिहास - 65
प्रकृति और हिंदुत्व ---2 :- चूंकि भारत गांव में निवास करता है , इसलिए पुरातन भारतीय अर्थव्यवस्था और जीवन पद्धति के अनुसार प्रत्येक गांव एक स्वतंत्र राष्ट्र की भांति व्यवहार करता था, और अपने आप में प्रत्येक ग्राम आत्मनिर्भर था । प्रत्येक व्यक्ति को अपनी आजीविका चलाने के लिए परंपरागत पैतृक व्यवसायों की व्यवस्था की गई थी । और कोई भी व्यक्ति बेरोजगार नहीं था । आज की शिक्षा पद्धति में जिन कामों को सिखाने के लिए सरकार करोड़ों रुपए खर्च करती है उन कार्यों में कुशलता बच्चे को घर से ही सीख कर मिल जाती थी । और उसका व्यवसाय उस क्षेत्र में आरक्षित था ।
एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के व्यवसायिक क्षेत्र पर अतिक्रमण करते हुए दूसरा कार्य नहीं करता था । आजीविका की सुरक्षा के लिए समाज भी अपने स्तर पर विभिन्न प्रकार की पाबंदियों के साथ और पंचायतों के दंड विधान के अनुसार लोगों की आजीविका को संरक्षित और सुरक्षित रखते थे । इस प्रकार भारत का व्यक्ति अपने कार्य में पूर्ण कुशल होता था । क्योंकि आज के हिसाब से कहा जाए तो आईटीआई और इंजीनियरिंग कॉलेज जैसा प्रशिक्षण विभिन्न प्रकार के कार्यों का जिसमें व्यक्ति का जीवन चलता है वह घर में ही मिल जाता था । और वो भी आर्टिफिशियल नहीं वास्तविक प्रशिक्षण होता था ।
जैसे लकड़ी का कार्य हो, और लोहे का कार्य हो , भवन निर्माण का कार्य हो , मिट्टी के बर्तन बनाने का कार्य हो या चमड़े का कार्य हो, सभी कार्यों में अपने पैतृक परंपरागत धंधे के अनुसार एक कुशल कारीगर के नाते 15 , 16 साल की उम्र से ही बच्चे तैयार हो जाते थे । जिससे अर्थोंपार्जन करते हुए अपने परिवार का संचालन पोषण एवं आर्थिक स्थिति को सुद्रण करने में अपना योगदान देते थे । तभी तो भारत धन वैभव के क्षेत्र में सोने की चिड़िया कहा जाता था ।
कपड़ा व्यापार और धातु उद्योग आदि में भी भारत में श्रेष्ठ कारीगर उपलब्ध होते थे । उसके उदाहरण पुरातात्विक विभाग की श्रेष्ठ इमारतें किले आदि और हथियार उपकरण भी देखने को मिलते है । इसी प्रकार तपस्वी ऋषि मुनियों के द्वारा अनुभव के आधार पर शोध करके बनाए गए नियम जो आज भी प्रासंगिक एवं वैज्ञानिक है और शास्त्रों में सूत्र रूप में संस्कृत भाषा में वेद पुराण उपनिषद गीता महाभारत रामायण श्रीमद्भागवत पुराण आदि में उल्लेखित है , वह सार्वभौमिक सत्य और मनुष्यों के लिए अद्वितीय देन है ।
जिसमें मानव कल्याण का मार्ग दिखाया गया है । कृषि, पशुपालन , गृह उद्योग , कुटीर उद्योग , आदि में भारत श्रेष्ठ था । वर्तमान व्यापार तंत्र और उद्योग जगत की नीतियों के कारण बेरोजगारी जैसी समस्याएं मुँह बाये खड़ी है । हिंदू जीवन पद्धति एवं दर्शन के अनुसार नर से नरोत्तम और नारायण बनने के लिए पतंजलि का अष्टांग योग आज भी अद्वितीय है । जिसमें मनुष्य यम नियम आसन प्राणायाम प्रत्याहार धारणा ध्यान और समाधि , जैसे गुणों को धारण करते हुए दिव्य एवं अलौकिक शक्तियों को प्राप्त करता है ।
जो ऐसे दिव्य प्रकाश से आलोकित हो जाता है कि पूरे विश्व का पालक मार्गदर्शक एवं संरक्षक होने की क्षमता रखता है । इस प्रकार की क्षमता को धारण करने वाला हिंदू धर्म और हिंदू जीवन पद्धति के मुकाबले आज विश्व में कोई जीवन पद्धति नहीं है । विश्व कल्याण का मार्ग इसी में निहित है । इसलिए विश्व , भारत की ओर आशाभरी नजरों से देख रहा है ।
अब जिम्मेदारी भारत के लोगों की बनती है कि इतने दिव्य ज्ञान के आलोकित होते हुए,अपने आपको तैयार करते हुए , अपने धर्म एवं भारतीय संस्कृति के आधार पर श्रेष्ठ मार्ग अपनाते हुए विश्व के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत करें । भारत माता की जय ।