भारत का गौरवशाली इतिहास - 64 प्रकृति और हिंदुत्व :-
भारत का गौरवशाली इतिहास - 64 प्रकृति और हिंदुत्व :-
हिंदुत्व की विचारधारा प्रकृति प्रेम पर आधारित है । प्रकृति का संरक्षण ,पोषण , जल जंगल जमीन पर्यावरण आदि का संरक्षण करने के लिए नदियों को माता का दर्जा , पृथ्वी को मातृभूमि का, पेड़ पौधों में देवताओं का वास , एवं उनकी शुद्धि को बनाए रखने के लिए उसी प्रकार की परंपराएं हिंदू त्योहारों में निर्धारित की गई । जिससे शुद्ध जल , वायु और भोजन व्यक्ति एवं जीव जंतुओं को प्राप्त होता रहे । अर्थात संपूर्ण जीव जगत के संरक्षण के लिए हिंदू परंपराओं में स्थान दिया गया है ।
इसी प्रकार जैसे वाह्य वातावरण को शुद्ध करने के लिए परंपराएं विकसित हुई उसी प्रकार व्यक्ति एवं जीव जगत के आंतरिक वातावरण, जैसे उसके विचार , उसकी भावनाएं , उसके सुख दुख आदि की चिंता करते हुए भी परंपराएं विकसित हुई, विश्व एक परिवार और विश्व में निवास करने वाली समाज को एक विराट पुरुष के रूप में परिभाषित कर , जैसे व्यक्ति के शारीरिक अंगों का समन्वय होकर व्यक्ति का जीवन चलता है , वैसे ही समाज के अलग-अलग वर्गों का आपस में समन्वय होकर समाज संचालित होता है ।
आदमी की व्यक्तिगत गुणधर्म प्रकृति के आधार पर उसकी विचार भावना, सुख दुख आदि की चिंता करते हुए हिंदू जीवन पद्धति में इस प्रकार की व्यवस्था बनाई गई की आदमी तो ठीक, जीव जंतुओं और पेड़ पौधों को भी किसी भी प्रकार का दुख कष्ट अथवा परेशानी ना हो । व्यक्ति के शरीर मन बुद्धि और आत्मा का समग्र विचार करते हुए शारीरिक सुख मानसिक सुख बौद्धिक सुख और आत्मा के साथ समग्र विचार किया गया और इस प्रकार की गर्भधारण से लेकर मृत्यु पर्यंत तक सोलह संस्कारों की व्यवस्था की गई ।
व्यक्ति का समग्र जीवन किस प्रकार से सुखमय व्यतीत होगा इसके लिए चार पुरुषार्थ , धर्म अर्थ काम और मोक्ष की कल्पना की गई । अर्थात धर्मानुसार अर्थ का उपार्जन करते हुए और धर्म अनुसार ही उसका उपभोग करते हुए मोक्ष को प्राप्त करना , अर्थात नर से नरोत्तम और नरोत्तम से नारायण बनने का मार्ग प्रशस्त किया गया । व्यक्ति की बढ़ती हुई उम्र के साथ ही , उसको किस उम्र में क्या करना चाहिए इसके लिए चार आश्रमों की व्यवस्था की गई , पहला ब्रम्हचर्य , दूसरा गृहस्थ , तीसरा संन्यास , और चौथा वानप्रस्थ , अर्थात बढ़ती उम्र के साथ अपने दायित्वों का यथा योग्य निर्वहन करते हुए परिवार और समाज के व्यवस्थित संचालन के लिए व्यक्ति यदि इन चरणों से होकर गुजरता है तो , समाज जीवन व्यवस्थित रूप से संचालित होता है ।
समाज में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति के गुण कर्म एवं स्वभाव अलग-अलग होने के कारण वर्णाश्रम व्यवस्था में चार वर्णों की व्यवस्था की गई , ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र , उनके अपने अलग-अलग कर्तव्य बताये गये जो इन कर्मों को धारित करता है , वह उस वर्ण का है , और यह व्यक्ति की स्वाभाविक मूल प्रकृति के आधार पर है पूर्ण तरह वैज्ञानिक कसौटी पर खरा उतरता है , इसके विपरीत यदि व्यक्ति इस सामाजिक व्यवस्था और परंपरा को ना मानते हुए अन्य मार्ग अपनाता है तो समाज में अव्यवस्था अराजकता की स्थिति उत्पन्न करता है , और यह मार्ग व्यक्ति को नर से नराधम और नराधम से नर पिशाच बनने के मार्ग पर अग्रसर करता है , *इसलिए हिंदू जीवन पद्धति के अनुसार जीवन मार्ग अपनाते हुए यदि व्यक्ति जीवन निर्वाह करता है तो हि श्रेष्ठ समाज का निर्माण हो सकता है ।* क्रमशः