भारत का गौरवशाली इतिहास - 52 , माँ दुर्गा का अर्थ शक्ति है! वैज्ञानिक विश्लेषण
भारत का गौरवशाली इतिहास - 52
*माँ दुर्गा का अर्थ है शक्ति ! एक वैज्ञानिक विश्लेषण*--- मनुष्य का शरीर असंख्य दुर्गरूपी लघु कोशिकाओं से निर्मित है, मनुष्य के मस्तिष्क में असंख्य अत्यंत गूढ़ लघु कोशिकाएं हैं। जितनी कोशिकाएं उतने बिजलीघर एवं प्रत्येक कोशिका किसी न किसी प्रकार की शक्ति का उत्पादन कर रही है परन्तु इन सबमें एक अद्भुत संयोजन है। यह संयोजन कौन कर रहा है? इन सबको एक सूत्र में कौन बांधे हुए हैं? इन सबको कौन समय-समय पर क्रियाशील कर रहा है, स्व चलित कर रहा है, बंद और चालू कर रहा है, आदेशित कर रहा है, किसके भय से ये सब एकसूत्र में बंधी हुई हैं यह सोचने का विषय है एवं यही श्री दुर्गा सप्तशती रहस्यम है।
शक्ति कहाँ से आती है? शक्ति कहाँ उत्पन्न हो रही है ? यह कोई नहीं जानता। डॉ. जगदीश चंद्र बसु ने एक अद्भुत यंत्र बनाया एवं उसमें उन्होंने चाँदी के तार की शक्ति नापने की कोशिश की। उन्होंने देखा कि कुछ घण्टों पश्चात अचानक यंत्र रुक गया क्योंकि चाँदी थक गई और उसे कुछ समय लगा पुनः शक्तिकृत होने में तब जाकर वह पुन: क्रियाशील हुई। उन्होंने रत्नों पर भी प्रयोग किए और पाया कि रत्न भी मर जाते हैं। उन्होंने कुछ रत्नों को विष में डुबो दिया और पाया कि रत्न मर गये, बुझ गये, उनमें शक्ति संचार बंद हो गया।
उन्होंने पेड़ों पर प्रयोग किया और देखा कि पेड़ हँस रहे हैं, पेड़ रो रहे हैं, पेड़ भी मनुष्यों के समान डर रहे हैं। एक विशेष प्रकार की चैतन्यता उन्होंने रत्नों में, जल में, वायु में, पेड़-पौधों में, धातुओं इत्यादि में पायी । उन्होंने देखा कि धातु भी रोती है, धातु भी डरती है, धातु भी सोती है, धातु भी थकती है अर्थात जो कुछ मनुष्यों में हो रहा है, जो संवेग मनुष्यों में हैं वो ही संवेग रत्नों, धातुओं, पेड़ पौधों में भी हैं बस फर्क इतना है कि कुछ हद तक मनुष्य अन्यों की अपेक्षा कुछ ज्यादा प्रखरता से अपने इन्द्रिय विकास के द्वारा संवेगा का प्रकट करने में सक्षम है।
डॉ. जगदीश चंद्र बसु ने 2 घड़ियाँ बनाई। एक घड़ी उन्होंने मंदिर में लगाई और एक घड़ी उन्होंने कारखाने में लगाई। कारखाने में लगी घड़ी जहाँ प्रदूषण, शोर-शराबा इत्याद था वहाँ पर कुछ ही दिनों में गलत समय बताने लगी अर्थात पीछे चलने लगी एवं दूसरी ओर जहाँ वेद-मंत्रों, पवित्र आवृत्तियों इत्यादि का गुंजन हो रहा था वहाँ पर लगी हुई घड़ी वर्षों तक सही समय बताती रही, कभी खराब नहीं हुई ।
डॉ. जगदीश चंद्र बसु ने दो वृक्ष लिए एक वृक्ष उन्होंने सड़क के किनारे लगा दिया और दूसरा वृक्ष घर में लगाया। घर में लगे हुए वृक्ष को उन्होंने पवित्र जल से सींचा, उसके सामने शक्ति संबंधित दिव्य कवचों एवं स्तोत्रों का पठन किया । ऐसा वृक्ष अति अल्प समय में पूर्ण रूप से विकसित होकर फल देने लगा, उसमें पुष्टि हो गई एवं दुर्गा तत्व का उसमें विकास हो गया । विज्ञान भी आज वैज्ञानिक दृष्टि से परा शक्तियों की महिमा का यशोगान कर रहा है।