भारत का गौरवशाली इतिहास - 45
भारत का गौरवशाली इतिहास - 45
30 सितम्बर ,, विश्व प्रसिद्ध आरती ॐ जय जगदीश हरे ...समेत अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथो के रचयिता तथा प्रसिद्ध ज्योतषी पंजाब के फिल्लौर शहर मे जन्मे पंडित श्रद्धा राम फिल्लौरी जी के जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें जी |
अंग्रेज़ो द्वारा नाभा के राजा समेत पंजाब मे हिन्दू सिखों के धर्मांतरण की योजना को विफल कर देने के कारण उन्हे शहर से निकाला दे दिया गया | पंडित जी द्वारा 1888 मे रचित उपन्यास '' भाग्यवती '' उस समय मे महिलाओ की स्थिति को बताने वाला चर्चित उपन्यास रहा है |
आरम्भिक जीवन - पंडित श्रद्धाराम शर्मा का जन्म- 30 सितम्बर, 1837 ई. जालंधर, पंजाब में हुआ। अमर आरती "ओम जय जगदीश हरे" सम्पूर्ण भारत में पंडित श्रद्धाराम शर्मा द्वारा लिखित 'ओम जय जगदीश हरे' की आरती गाई जाती है। श्रद्धाराम शर्मा जी ने इस आरती की रचना 1870 ई. में की थी। पंडित जी सनातन धर्म प्रचारक, ज्योतिषी, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और संगीतज्ञ होने के साथ-साथ हिन्दी और पंजाबी के प्रसिद्ध साहित्यकार भी थे। अपनी विलक्षण प्रतिभा और ओजस्वी वाक्पटुता के बल पर उन्होंने पंजाब में नवीन सामाजिक चेतना एवं धार्मिक उत्साह जगाया था,
जिससे आगे चलकर आर्य समाज के लिये पहले से निर्मित एक उर्वर भूमि मिली।क़रीब डेढ़ सौ वर्ष में मंत्र और शास्त्र की तरह लोकप्रिय हो गई "ओम जय जगदीश हरे" आरती जैसे भावपूर्ण गीत की रचना करने वाले पंडित श्रद्धाराम शर्मा का जन्म ब्राह्मण कुल में 30 सितम्बर, 1837 में पंजाब के जालंधर ज़िले में लुधियाना के पास एक गाँव 'फ़िल्लौरी' (फुल्लौर) में हुआ था। उनके पिता जयदयालु स्वयं एक अच्छे ज्योतिषी और धार्मिक प्रवृत्ति के थे।
ऐसे में बालक श्रद्धाराम को बचपन से ही धार्मिक संस्कार विरासत में मिले थे। पिता ने अपने बेटे का भविष्य पढ़ लिया था और भविष्यवाणी की थी कि "ये बालक अपनी लघु जीवनी में चमत्कारी प्रभाव वाले कार्य करेगा।"बचपन से ही श्रद्धाराम शर्मा जी की ज्योतिष और साहित्य के विषय में गहरी रुचि थी। उन्होंने वैसे तो किसी प्रकार की शिक्षा हासिल नहीं की थी, परंतु उन्होंने सन 1844 में अर्थात मात्र सात वर्ष की उम्र में ही गुरुमुखी लिपि सीख ली थी। दस साल की उम्र में संस्कृत, हिन्दी, फ़ारसी, पर्शियन (पारसी) तथा ज्योतिष आदि की पढ़ाई शुरू की और कुछ ही वर्षों में वे इन सभी विषयों के निष्णात हो गए। उनका विवाह एक सिक्ख महिला महताब कौर के साथ हुआ था।
साहित्यिक परिचय --पंडित श्रद्धाराम शर्मा सनातन धर्म प्रचारक, ज्योतिषी, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, संगीतज्ञ तथा हिन्दी के ही नहीं, बल्कि पंजाबी के भी श्रेष्ठ साहित्यकारों में से एक थे। इनकी गिनती उन्नीसवीं शताब्दी के श्रेष्ठ साहित्यकारों में होती थी। अपनी विलक्षण प्रतिभा और ओजस्वी वक्तृता के बल पर उन्होंने पंजाब में नवीन सामाजिक चेतना एवं धार्मिक उत्साह जगाया, जिससे आगे चलकर आर्य समाज के लिये पहले से निर्मित उर्वर भूमि मिली। उनका लिखा उपन्यास 'भाग्यवती' हिन्दी के आरंभिक उपन्यासों में गिना जाता है। पं. श्रद्धाराम शर्मा गुरुमुखी और पंजाबी के अच्छे जानकार थे और उन्होंने अपनी पहली पुस्तक गुरुमुखी मे ही लिखी थी; परंतु वे मानते थे कि हिन्दी के माध्यम से इस देश के ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक अपनी बात पहुंचाई जा सकती है।
उन्होंने अपने साहित्य और व्याख्यानों से सामाजिक कुरीतियों और अंधविश्वासों के ख़िलाफ़ जबर्दस्त माहौल बनाया था। उन्होंने सनातन धर्म का प्रचार-प्रसार किया और उसी क्रम में ओम जय जगदीश हरे आरती रची।पंडित श्रद्धाराम शर्मा ने सन 1866 में पंजाबी (गुरुमुखी) में 'सिखों दे राज दी विथिया' और 'पंजाबी बातचीत' जैसी किताबें लिखकर मानो क्रांति ही कर दी। अपनी पहली ही पुस्तक 'सिखों दे राज दी विथिया' से वे पंजाबी साहित्य के पितृपुरुष के रूप में प्रतिष्ठित हो गए और उनको "आधुनिक पंजाबी भाषा के जनक" की उपाधि मिली। बाद में इस रचना का रोमन में अनुवाद भी हुआ। इस पुस्तक में सिक्ख धर्म की स्थापना और इसकी नीतियों के बारे में बहुत सार गर्भित रूप से बताया गया था।
पुस्तक में तीन अध्याय हैं। इसके तीसरे और अंतिम अध्याय में पंजाब की संकृति, लोक परंपराओं, लोक संगीत, व्यवहार आदि के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई थी। इसी कारण से शायद इस पुस्तक को उच्च कक्षा की पढाई के लिए चुना गया। अंग्रेज़ सरकार ने तब होने वाली आई.सी.एस. (जिसका भारतीय नाम अब 'आई.ए.एस.' हो गया है) परीक्षा के कोर्स में, अनिवार्य पठनीय पुस्तक विषय के रूप में इस पुस्तक को शामिल किया था। "पंजाबी बातचीत" में मालवा, मझ्झ जैसे प्रान्तों में जो इस्तेमाल की जातीं हैं, वह बोली, बातचीत, पहनावा, सोच, मुहावरे, कहावतें जैसी बातों को समेटा गया है। "पंजाबी बातचीत" को अंग्रेज़ ब्रिटिश राज के समय पंजाबी भाषा सीखने के लिए सबसे बड़ा सहारा समझते थे।
भारत के घर-घर और मंदिरों में 'ओम जय जगदीश हरे' के शब्द वर्षों से गूंज रहे हैं। दुनिया के किसी भी कोने में बसे किसी भी सनातनी हिन्दू परिवार में ऐसा व्यक्ति खोजना मुश्किल है, जिसके हृदय-पटल पर बचपन के संस्कारों में 'ओम जय जगदीश हरे' के शब्दों की छाप न पड़ी हो। इस आरती के शब्द उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत के हर घर और मंदिर मे पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ गाए जाते हैं।
पंडित श्रद्धाराम शर्मा को भारत के प्रथम उपन्यासकार के रूप में भी जाना जाता है। उन्होंने 1877 में 'भाग्यवती' नामक एक उपन्यास लिखा था, जो हिन्दी में था। माना जाता है कि यह हिन्दी का पहला उपन्यास है। इस उपन्यास की पहली समीक्षा अप्रैल, 1887 में हिन्दी की मासिक पत्रिका 'प्रदीप' में प्रकाशित हुई थी। इसके प्रकाशन से पहले ही पंडित श्रद्धाराम शर्मा जी का निधन हो गया, परंतु उनकी मृत्यु के बाद उनकी पत्नी ने काफ़ी कष्ट सहन करके भी इस उपन्यास का प्रकाशन करवाया। इसे पंजाब सहित देश के कई राज्यों के स्कूलों में कई सालों तक पढ़ा जाता रहा।
पंडित श्रद्धाराम शर्मा के जीवन और उनके द्वारा लिखी गई पुस्तकों पर 'गुरु नानक विश्वविद्यालय' के हिन्दी विभाग के डीन और हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. हरमिंदर सिंह ने ज़बर्दस्त शोध कर तीन संस्करणों में 'श्रद्धाराम ग्रंथावली' का प्रकाशन भी किया। उनका मानना था कि पं. श्रद्धाराम का "भाग्यवती" उपन्यास जो 1888 में निर्मल प्रकाशन से प्रकाशित हुआ था, हिन्दी साहित्य का सबसे पहला प्रकाशित उपन्यास है। लेकिन यह मात्र हिन्दी का ही पहला उपन्यास नहीं था, बल्कि कई मायनों में यह पहला था। ज्ञातव्य है कि अब तक लाला श्रीनिवासदास के 'परीक्षा गुरु' को हिन्दी का पहला उपन्यास माना जाता रहा है। 'द ट्रिब्यून'में प्रकाशित समाचार/लेखों का सन्दर्भ लिया जाए तो 'भारतीय साहित्य अकादमी' ने भी फिल्लौरीजी के उपन्यास "भाग्यवती" को हिन्दी का सबसे पहला उपन्यास माने जाने को मान्यता दे दी है।
इस तरह हिन्दी साहित्य के इतिहास को और ख़ासकर हिन्दी उपन्यास के इतिहास के पुनर्लेखन की दिशा में एक नई पहल हुई है। स्मरणीय बात यह है कि "भाग्यवती" जेंडर इश्यू के सन्दर्भ में भी एक क्रांतिकारी रचना है, क्योंकि इस उपन्यास की केंद्रीय मान्यता ही यही है कि बेटी बेटे से किसी बात में कम नहीं होती।
आज जिस पंजाब में सबसे ज़्यादा कन्याओं की भ्रूण हत्याएं होती हैं, इसका एहसास पंडित श्रद्धाराम शर्मा ने बहुत पहले कर लिया था और इस विषय पर उन्होंने 'भाग्यवत' उपन्यास लिखा, जो समय से बहुत पहले ये सोच लेकर सामने आया कि स्त्री शिक्षा, स्त्री को समानता का दर्जा मिलना स्वस्थ समाज के लिए लाभकारी है। इस उपन्यास में उन्होंने काशी के एक पंडित उमादत्त की बेटी भगवती के किरदार के माध्यम से 'बाल विवाह' जैसी कुप्रथा पर ज़बर्दस्त चोट की थी।
श्रद्धाराम शर्मा जी ने लड़कियों को तब पढ़ाने की वकालात की, जब लड़कियों को घर से बाहर तक नहीं निकलने दिया जाता था, परंपराओं, कुप्रथाओं और रुढ़ियों पर चोट करते रहने के बावजूद वे लोगों के बीच लोकप्रिय बने रहे। जबकि वह एक ऐसा दौर था, जब कोई व्यक्ति अंधविश्वासों और धार्मिक रुढ़ियों के ख़िलाफ़ कुछ बोलता था तो पूरा समाज उसके ख़िलाफ़ हो जाता था। निश्चय ही उनके अंदर अपनी बात को कहने का साहस और उसे लोगों तक पहुँचाने की जबर्दस्त क्षमता थी।
निधन - श्रद्धाराम शर्मा जी का स्वर्गवास मात्र 44 वर्ष की अल्पायु में 24 जून, 1881 को लाहौर में हुआ। हिन्दी के जाने-माने लेखक और साहित्यकार रामचंद्र शुक्ल ने पंडित श्रद्धाराम शर्मा और भारतेंदु हरिश्चंद्र को हिन्दी के पहले दो लेखकों में माना है। उनके अन्तिम समय में, वे ये कहते हुए चल बसे कि "आज से हिन्दी का बस एक ही सच्चा सपूत रह जायेगा, जब मैं जा रहा हूँ।" उनका इशारा भारतेंदु हरिश्चंद्र जी की और था। उस समय कहे ये भावपूर्ण शब्द शायद अतिश्योक्ति से लगे हों, पर ये सच निकले। रामचंद्र शुक्ल जी जो आलोचक थे, वे कहते हैं कि "श्रद्धाराम जी की वाणी में तेज और सम्मोहन भी था और वे अपने समय के एक प्रखर लेखक कहलाये जायेंगें।"