भारत का गौरवशाली इतिहास -38

भारत का गौरवशाली इतिहास -38

भारतीय संस्कृति  का अनूठा पर्व श्राद्ध और प्रकृति संरक्षण -- सनातन धर्म में पीपल ओर बरगद को  पूर्वजों की संज्ञा दी गई है क्योंकि पीपल ऐसा वृक्ष है जो बहुत ज्यादा ऑक्सीजन देता है और बरगद ऐसा पेड़ है जो बहुत ही औषधिय गुण से भरपूर है. प्रकृति ने यह दोनों उपयोगी वृक्षों को लगाने के लिए अलग ही व्यवस्था कर रखी है ।
           जब कौए इन दोनों वृक्षों के फल को खाते हैं तो उनके पेट में ही बीज की प्रोसेसिंग होती है और तब यह बीज उगने लायक होते हैं. उसके पश्चात कौवे जहाँ-जहाँ बीट करते हैं, वहाँ-वहॉं पर यह दोनों वृक्ष उगते हैं. इसीलिए पीपल और बरगद के वृक्ष कई बार ऊंची इमारतों एवं दीवारों में उग जाते है।
         इसलिए हम समझ सकते हैं कि - अगर इन दोनों वृक्षों को उगाना है तो कौवे (एवं कुछ अन्य पक्षियों) की मदद बिना संभव नहीं है. इसलिए अगर इन पेड़ों को बचाना है तो कौवे को बचाना पड़ेगा. पक्षी वैज्ञानिकों के अनुसार मादा कौआ भादों महीने में अंडा देती है और नवजात बच्चा जन्म लेता है. 
        ऐसे में इस उपयोगी पक्षी और उसके नवजात बच्चे को पौष्टिक और भरपूर आहार मिलना जरूरी है. हमारे पूर्वजों ने श्राद्ध के वहाने छत पर पैष्टिक भोजन रखने की व्यवस्था की है जिससे कि कौवों और उनके नवजात बच्चों को बिना किसी परेशानी के पौष्टिक आहार  मिल सके और उनका पोषण हो सके। 
          *इसीलिए श्राद्ध / तर्पण करना न सिर्फ हमारी आस्था का विषय है बल्कि यह हमारी प्रकृति के रक्षण के लिए भी बहुत जरूरी है* -- नवीन वर्मा #Hariawalpunjab

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