भारत का गौरवशाली इतिहास -18

भारत का गौरवशाली इतिहास  -18

*आज अफगानिस्तान में लोग अपनी घर की महिलाओं को तालिबानों के लिए छोड़कर भाग रहे है ...इस अवसर पर आपको वीर भूमि चित्तौड़ की सत्य कथा सुनाता हूं।*

चितौड़ के वीर-वीरांगनाओं का नाम इतिहास के पन्नों में स्वाभिमान, आक्रांताओं के सामने झुकने के बजाय मर मिटने के लिए पहचाना जाता है। ऐतिहासिक धरा चित्तौडगढ़़ के गौरवशाली व स्वाभिमानी इतिहास की प्रतीक रानी पद्मिनी समेत हजारों वीरांगनाएं हैं। इनके जौहर की गाथाएं सदियों तक भुलाई नहीं जा सकती, मगर जौहर स्थलों की पहचान जिम्मेदार विभाग की उपेक्षा से गुम होने की स्थिति में हैं। चित्तौड़ का गौरवशाली इतिहास तीन जौहर का साक्षी रहा है। इनमें हजारों वीरांगनाओं ने अपनी आन-बान की रक्षा के लिए धधकती ज्वाला में कूदकर प्राणों की आहुतियां दी थी।
        मुगलों व आक्रांताओं के आक्रमण के समय ये तीनों जौहर हुए हैं। तीन जौहर स्थलों में से दो के बारे में लोग लगभग अनजान हैं। एक जौहर स्थल विजय स्तंभ व गौमुख कुंड के पास स्थित है। इसके लिए यहां एक छोटा सा साइन बोर्ड लगा हुआ है। वहीं दो अन्य जौहर स्थलों में एक कुंभा महल में सुरंग तथा दूसरा भीमलत कुंड के पास बताया जाता है। इनका भी जिक्र न जौहर स्थली के रूप में है और न यहां जौहर करने का संकेत चिन्ह लगा है। इनके बारे में आम लोगों को कोई जानकारी नही
          चित्तौड़ का पहला जौहर सन 1303 में हुआ, जब अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया। किवदंति है कि रूपवान रानी पद्मिनी को देखने की लालसा में अलाउद्दीन ने यहां पड़ाव डाला। राणा रतनसिंह की पत्नी पद्मिनी ने चतुराई से शत्रु का सामना किया। *अपनी मर्यादा व राजपूती स्वाभिमान की खातिर पद्मिनी ने विजय स्तम्भ के समीप सोलह हजार रानियों, दासियों व बच्चों के साथ जौहर की अग्नि में स्नान किया था।* गोरा और बादल जैसे वीरों ने भी इसी समय पराक्रम दिखाया था। आज भी विजय स्तंभ के पास यह जगह जौहर स्थली के रूप में पहचानी जाती है। इतिहास का सबसे पहला और चर्चित जौहर स्थल इसे माना जाता है, लेकिन यह अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की उपेक्षा का शिकार है। पहचान के नाम पर यहां महज छोटा संकेत बोर्ड लगा है। इसका विकास न के बराबर है। 
       चित्तौड़ का दूसरा जौहर सन 1535 में हुआ, जब गुजरात के शासक बहादुरशाह ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया। *कर्णावती ने शत्रु की अधीनता स्वीकार नहीं की और ,तरह हजार रानियों के साथ जौहर किया।* 
      तीसरा जौहर 1567 में हुआ जब अकबर ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया। *रानी फूलकंवर ने हजारों रानियों के साथ जौहर किया। जयमल-फत्ता भी इसी युद्ध में शहीद हुए।*

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